एक आदमी मरते वक़्त कितना मर जाता है
पूरा नहीं मरता है शायद
वह रह जाता है
अपने बाग़ - बगीचों में
अपने झूठे किये हुए बर्तनो में
उसके कमरे में
एक खुसबू की तरह
किसी के दिल में
यादों की तरह
वो तस्बीरों में
रह जाता है
रंगो की तरह
एक आदमी जो मर गया है
वो नहीं मारा है
उसके छाप है
हर जगह
उसकी उँगलियों ने जो छुए है
जो स्पर्श है
वो याद है
उसे , जिसे
उसने छुआ था
एक पेड़ में
वो रह गया है बीज की तरह
एक आदमी मर के भी नहीं मारा
वो रह गया है
कही किसी कोने में
खामोसी की तरह
वो गुनगुना रहा है
अपनी खामोसी
किसी के कान में
वो गुजरा नहीं है
वो रह गया है
वो बस गया है
उन लोगो में
जो जीवन को जी रहे है
 वो भी जिन्दा है
कही न कही
किसी में
किसी के ह्रदय के कोने में
और देख रहा है अपना भविस्य
अपना कल
और आज
वो जिन्दा है
और जिन्दा ही रहेगा
जो कल मर गया है

प्रिया मिश्रा :)

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