चाँद एक रोज मेरे आँगन में उतरा
वो जरा उदास सा था
शायद वो अगले दिन फिर निकलना चाहता था
लेकिन अगले दिन अमावश थी
अब क्या करे हमारी  इक्षा
हर बार पूरी नहीं होती
लेकिन चाँद को ये खबर ना थी
वो अब भी उदाश था
और ताक रहा था आसमान को
की शायद
अमावश पूर्णिमा में बदल जाये
और चाँद फिर से जगमगाये ||

प्रिया मिश्रा :)

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जिनके थाली में रोटी है वो कहाँ समझ पाएंगे
की रोटी कितनी महंगी है
उन्हें तो बस इतना पता है
ना खुद खाएंगे
ना किसी को खाने देंगे ||

प्रिया मिश्रा :)
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कोइ हाथ मिलाये तो उसे गले लगा लेने  बुराई नहीं है
शर्त बस इतनी हो
उसके हाथ में नाख़ून न हो
और बातो में मिठास न हो ||

प्रिया मिश्रा :)

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आज कुछ लिखने का जी नहीं करता
चलो रहने देते है
शब्दों को  यु ही क्या जाया करना ||

प्रिया मिश्रा :)

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