प्रेम

प्रेम एक खाल है
जब खाल उतर जाता है
लोग मांस को पका के खा जाते है
प्रेम भूक की बलि चढ़ जाता है ||

प्रेम परिस्थियों का गुलाम है
जब परिस्थितियाँ  बदल जाती है
प्रेम बदल जाता है
और वो समय की बलि चढ़ जाता है ||

प्रेम सुंदरता का भी गुलाम है
एक चेहरे में अगर शाम हो जाये
वो दूसरे चेहरे में सुबह ढूंढ लेता है
इस तरह वो शाम - सुबह में डूब  जाता है ||

प्रेम शब्दों का भी मान नहीं रखता
वो बदलता रहता है अपने  शब्द
और कहानी बदलती रहती है
पीढ़ी दर पीढ़ी
वो आधीन है , पराजित है
उनसे जिन्हे शब्दों को बदलना आता है ||

प्रेम कोइ पूजा करने की देवी नहीं
ना ही देवता है
वो तो एक तिरस्कार है
उसे तिरस्कृत ही होना चाहिए
क्युकी  आने वाले समय में
वो एक श्राप है ||

प्रिया मिश्रा :)

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