सब मिथ्या है , सब राख है


शमशान में जाके सारा अभिमान धूल जाता है
जब राख ही राख नजर आता है ||
मिटटी के शरीर को
मिटटी में मिल जाना है
फिर ये साभिमान
अभिमान कहाँ  काम आना है
हो सकता है
कल की सुबह
सूर्य उगे
लेकिन मैं ना रहूं
तो बस इतना याद रखना
जिंदगी आगे बहोत है
जब तक है
कुछ अच्छा करना और मुस्कुराते जाना
क्युकी आखिर में सबको
अपने कर्म से ही लुभा पावोगे
न कुछ लेके आये
ना कुछ लेके जाओगे
क्युकी , बाकि सब 
सब मिथ्या है
और सब राख है

तो मुस्कुराओ
और किसी की मुस्कुराने की वजह बन जाओ
यही जिंदगी है
बाकि सब मिथ्या है
और राख है
और सत्य सिर्फ एक है
अग्नि
और उससे निकलती हुई लपटे
और खोता हुआ शरीर
और मुक्त होती आत्मा
बाकि सब मिथ्या है
राख है ||

प्रिया मिश्रा :)

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