भूखे के भी अपने कायदे कानून है
लेकिन सायद वो सिमट के रह गयी है
रोटी की गोल सी मानचित्र में
उसने राष्ट्र का आकार नहीं लिया
वो शहरो के आकार में भी नहीं ढला
वो सिमित रह गया
एक रोटी के आकार में
वो नहीं ढल पाया सदाचार में
वो बस ढूंढता रहा
एक अन्न का आसन और
अन्न का ही ओढ़ना
अन्न का घर
और अन्न का ही स्वपन्न
बस इसी कायदे कानून में वो सिमट गया
जो उसके भूखे पेट ने बनाये
और उस तक ही सिमट के रह गए
जैसे सिमटती जा रही है
पृथ्वी , मानवता के अभाव में ||
प्रिया मिश्रा :)
लेकिन सायद वो सिमट के रह गयी है
रोटी की गोल सी मानचित्र में
उसने राष्ट्र का आकार नहीं लिया
वो शहरो के आकार में भी नहीं ढला
वो सिमित रह गया
एक रोटी के आकार में
वो नहीं ढल पाया सदाचार में
वो बस ढूंढता रहा
एक अन्न का आसन और
अन्न का ही ओढ़ना
अन्न का घर
और अन्न का ही स्वपन्न
बस इसी कायदे कानून में वो सिमट गया
जो उसके भूखे पेट ने बनाये
और उस तक ही सिमट के रह गए
जैसे सिमटती जा रही है
पृथ्वी , मानवता के अभाव में ||
प्रिया मिश्रा :)
Bahut khub
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