स्वप्न (भाग १ )
अच्छा सुनो ये अकेले में बैठ के पानी में पत्थर मारने का क्या फायदा | क्या सोचते रहते हो इतना ?
कुछ नहीं |
कुछ नहीं में लोग पत्थर नहीं मारते |
तो क्या करते है ?
वो तो पता नहीं लेकिन तुम्हारी तरह झूट भी तो नहीं बोलते |
मैंने क्या झूट बोला ?
सच भी तो नहीं बोला |
तुम जानते तो हो तुम खुद को मुझसे नहीं छुपा सकते | फिर ये स्वांग क्यों ?
क्या स्वांग ? क्या पागलो जैसे बातें करती रहती हो ?
हां पागल तो हूँ , लेकिन इतनी भी नहीं की पढ़ ना सकू |
क्या पढ़ न सकूँ ?
आज भांग खाया है क्या ?
नहीं बस , लेकिन नशा तो है |
अच्छा किसका ?
गुलाबी रंग का |
कौन सी गुलाबी रंग का ?
वहीँ जो सदियों से हवाओँ में थी | लेकिन महसूस ना कर पाई कभी |
अच्छा कवित्री होती जा रही हो |
हाँ सच कहा तुमने, शब्द चुनने लगी हूँ, जबसे तुमसे मिली हूँ |
क्यों उस से पहले ज्ञान ना था, आपको मोहतरमा ?
ज्ञान तो बहोत था लेकिन उनमे प्रकाश नहीं था |
वो अच्छा , आज सारा श्रेय मुझे क्यों ?
क्या बात है मुर्गा हलाल करने का इरादा है ?
नहीं मुर्गे को दाना डाल रही हूँ ,सायद फंस जाये |
अच्छा तो ये बात हैं |
ये देर से आने के लिए तो नहीं है ?
नहीं , नहीं न बाबा ये माफ़ी वाली तारीफ नहीं है | ये तो सच की तारीफ है |
अच्छा सुनो , तुम मीठा स्वपन्न हो मेरे लिए | डर लगता है कही कोइ नींद से जगा ना दे |
अच्छा तो फिर मैं ही जगाउंगी तुम्हे एक दिन देख लेना |
अच्छा फिर क्या करोगी ?
कुछ नहीं मैं तो बस तुम्हे सुनते रहना चाहती हूँ |
अच्छा फिर से मक्खन |
हाँ मक्खन तो मक्खन ही सही , तुम जो मानो |
अच्छा सुनो , बता दो ना क्या सोचते रहते हो ?
कुछ नहीं बस यही की, ये नदी के दो किनारे अलग क्यों है ?
ये धरती आसमान अलग क्यों है ?
क्या कभी धरती का मन नहीं होता आसमान के चाहत की ?
तो फिर अलग क्यों है ?
कही हमें अलग होना हुआ तो ?
तुम जानती हो मैं किसी से कुछ कह नहीं पाउँगा, मेरे अंदर इतना साहस नहीं | और तुम्हे भूलने की आदत नहीं |
अच्छा तो ये बात है |
आदत नहीं तो बना ही लोगे
मुझे तुम एक दिन भुला ही दोगे
लेकिन मैं तुम्हे याद बना दूंगी
अपने शब्दों में सजा दूंगी
तुम मुस्कुराना मेरे शब्दों में
और मैं कविता बना लुंगी ||
फिर से कविता ?
हां सिख रही हूँ
जब तक तुम लौट के आवोगे इन्ही से तो जीवन कटेगा |
अगर मैं नहीं आया तो ?
तुम्हारा आना तो निश्चित है | बिधाता ने हमें मिलाया है | ये तो नियति है हमारी की हमें मिलना है |
तुम हो सुबह
मैं रात सही
प्रेम शाम बन जायेगा
और एक दिन हमें मिलाएगा ||
फिर से कविता
हां तुम्हारे लिए ||
तुम्हारे नाम को अंकित जो करना है अपने शब्दों के सहारे अपने कविता में कैद कर लुंगी तुम्हे और फिर उस सपने की कभी सुबह ना होगी ||
सखी संवाद (भाग २ )
सुबह तो हो गयी हैं मैडम
अच्छा तो मुझे जगाया क्यों ?
ताकि आप समझ पाए वो कहानी गुजर चुकी है |
कहानियाँ बनती है, गुजरती नहीं है |
गुजरता तो इतिहास है
लेकिन उसका क्या इतिहास बन सकता है ? जो गुजरा ही न ठहर गया हो कही ?
तू आज तक उस कहानी के सहारे क्यों जीना चाहती है ?
मैं उसे ढूंढना चाहती हूँ, क्या पता वो भी मुझे ढूंढ रहा हो और अनंन्त तक ढूंढ़ता रहे ?
वो नहीं ढूंढेगा तुम्हे , उसे अगर तुम्हे ढूंढना होता तो बता के नहीं जाता |
यूँ कह देना की रस्ते अलग है, क्या वो सही था ?
और क्या तुम्हे भूल जाने की कसम देना सही था ?
हो सकता है उसकी मज़बूरी हो |
कैसे मज़बूरी ?
रिश्ते मज़बूरी में नहीं वादों से बनते है निभाने से बनते है |
चलो मान लिया मज़बूरी होगी |
एक बात बताओ , क्या उसमे उस मज़बूरी में अपने दोस्तों को छोड़ा नहीं |
अपने भाई - बहन को , नहीं |
अपने माँ - पापा को , नहीं
फिर तुम्हे क्यों छोड़ के चला गया ?
क्या तुम ही उसके राह की बाधक थी ?
क्या तुमसे ही उसका जीवन रुक गया था ?
क्या ढूंढ़ने चला गया ?
कहता तो था तुम उसके लिए कीमती हो | फिर कौन सा ऐसा खजाना मिल गया उसको ?
वजह जो भी रही हो | वो चला गया है | अच्छा है तुम भूल जाओ |
नहीं मैं इन्तजार करुँगी
और करती रहूंगी
तब तक जब तक की वो आ नहीं जाता मेरे पास
मुझे बिश्वाश है वो आएगा
एक दिन जरूर
फिर स्वपन नहीं होगा
हकीकत होगा सब कुछ
हां सबकुछ ||
प्रिया मिश्रा :)
अच्छा सुनो ये अकेले में बैठ के पानी में पत्थर मारने का क्या फायदा | क्या सोचते रहते हो इतना ?
कुछ नहीं |
कुछ नहीं में लोग पत्थर नहीं मारते |
तो क्या करते है ?
वो तो पता नहीं लेकिन तुम्हारी तरह झूट भी तो नहीं बोलते |
मैंने क्या झूट बोला ?
सच भी तो नहीं बोला |
तुम जानते तो हो तुम खुद को मुझसे नहीं छुपा सकते | फिर ये स्वांग क्यों ?
क्या स्वांग ? क्या पागलो जैसे बातें करती रहती हो ?
हां पागल तो हूँ , लेकिन इतनी भी नहीं की पढ़ ना सकू |
क्या पढ़ न सकूँ ?
आज भांग खाया है क्या ?
नहीं बस , लेकिन नशा तो है |
अच्छा किसका ?
गुलाबी रंग का |
कौन सी गुलाबी रंग का ?
वहीँ जो सदियों से हवाओँ में थी | लेकिन महसूस ना कर पाई कभी |
अच्छा कवित्री होती जा रही हो |
हाँ सच कहा तुमने, शब्द चुनने लगी हूँ, जबसे तुमसे मिली हूँ |
क्यों उस से पहले ज्ञान ना था, आपको मोहतरमा ?
ज्ञान तो बहोत था लेकिन उनमे प्रकाश नहीं था |
वो अच्छा , आज सारा श्रेय मुझे क्यों ?
क्या बात है मुर्गा हलाल करने का इरादा है ?
नहीं मुर्गे को दाना डाल रही हूँ ,सायद फंस जाये |
अच्छा तो ये बात हैं |
ये देर से आने के लिए तो नहीं है ?
नहीं , नहीं न बाबा ये माफ़ी वाली तारीफ नहीं है | ये तो सच की तारीफ है |
अच्छा सुनो , तुम मीठा स्वपन्न हो मेरे लिए | डर लगता है कही कोइ नींद से जगा ना दे |
अच्छा तो फिर मैं ही जगाउंगी तुम्हे एक दिन देख लेना |
अच्छा फिर क्या करोगी ?
कुछ नहीं मैं तो बस तुम्हे सुनते रहना चाहती हूँ |
अच्छा फिर से मक्खन |
हाँ मक्खन तो मक्खन ही सही , तुम जो मानो |
अच्छा सुनो , बता दो ना क्या सोचते रहते हो ?
कुछ नहीं बस यही की, ये नदी के दो किनारे अलग क्यों है ?
ये धरती आसमान अलग क्यों है ?
क्या कभी धरती का मन नहीं होता आसमान के चाहत की ?
तो फिर अलग क्यों है ?
कही हमें अलग होना हुआ तो ?
तुम जानती हो मैं किसी से कुछ कह नहीं पाउँगा, मेरे अंदर इतना साहस नहीं | और तुम्हे भूलने की आदत नहीं |
अच्छा तो ये बात है |
आदत नहीं तो बना ही लोगे
मुझे तुम एक दिन भुला ही दोगे
लेकिन मैं तुम्हे याद बना दूंगी
अपने शब्दों में सजा दूंगी
तुम मुस्कुराना मेरे शब्दों में
और मैं कविता बना लुंगी ||
फिर से कविता ?
हां सिख रही हूँ
जब तक तुम लौट के आवोगे इन्ही से तो जीवन कटेगा |
अगर मैं नहीं आया तो ?
तुम्हारा आना तो निश्चित है | बिधाता ने हमें मिलाया है | ये तो नियति है हमारी की हमें मिलना है |
तुम हो सुबह
मैं रात सही
प्रेम शाम बन जायेगा
और एक दिन हमें मिलाएगा ||
फिर से कविता
हां तुम्हारे लिए ||
तुम्हारे नाम को अंकित जो करना है अपने शब्दों के सहारे अपने कविता में कैद कर लुंगी तुम्हे और फिर उस सपने की कभी सुबह ना होगी ||
सखी संवाद (भाग २ )
सुबह तो हो गयी हैं मैडम
अच्छा तो मुझे जगाया क्यों ?
ताकि आप समझ पाए वो कहानी गुजर चुकी है |
कहानियाँ बनती है, गुजरती नहीं है |
गुजरता तो इतिहास है
लेकिन उसका क्या इतिहास बन सकता है ? जो गुजरा ही न ठहर गया हो कही ?
तू आज तक उस कहानी के सहारे क्यों जीना चाहती है ?
मैं उसे ढूंढना चाहती हूँ, क्या पता वो भी मुझे ढूंढ रहा हो और अनंन्त तक ढूंढ़ता रहे ?
वो नहीं ढूंढेगा तुम्हे , उसे अगर तुम्हे ढूंढना होता तो बता के नहीं जाता |
यूँ कह देना की रस्ते अलग है, क्या वो सही था ?
और क्या तुम्हे भूल जाने की कसम देना सही था ?
हो सकता है उसकी मज़बूरी हो |
कैसे मज़बूरी ?
रिश्ते मज़बूरी में नहीं वादों से बनते है निभाने से बनते है |
चलो मान लिया मज़बूरी होगी |
एक बात बताओ , क्या उसमे उस मज़बूरी में अपने दोस्तों को छोड़ा नहीं |
अपने भाई - बहन को , नहीं |
अपने माँ - पापा को , नहीं
फिर तुम्हे क्यों छोड़ के चला गया ?
क्या तुम ही उसके राह की बाधक थी ?
क्या तुमसे ही उसका जीवन रुक गया था ?
क्या ढूंढ़ने चला गया ?
कहता तो था तुम उसके लिए कीमती हो | फिर कौन सा ऐसा खजाना मिल गया उसको ?
वजह जो भी रही हो | वो चला गया है | अच्छा है तुम भूल जाओ |
नहीं मैं इन्तजार करुँगी
और करती रहूंगी
तब तक जब तक की वो आ नहीं जाता मेरे पास
मुझे बिश्वाश है वो आएगा
एक दिन जरूर
फिर स्वपन नहीं होगा
हकीकत होगा सब कुछ
हां सबकुछ ||
प्रिया मिश्रा :)
Bhot hi umda likha hai ji..😎👌👌👌
ReplyDeletethank you ji :)
ReplyDeleteGood
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