फ़रिश्ते इंसान नहीं बन सकते
पशु इंसान नहीं बन सकते
लेकिन इंसान को ये दोनों ही
वरदान प्राप्त है
इंसान फरिश्ता भी बन सकता है
और पशु भी
सोच इंसान की है
चुनाव इंसान का है ||

प्रिया मिश्रा :)


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कभी - कभी मैं इतना लिखती हूँ
की मैं भूल जाती हूँ की मैं मनुस्य हूँ
मैं लेखनी का जीवन जीने लगती हूँ
और फिर निब टूट जाती  है
तब ख्याल आता है
कागज रगड़ खा रहा है
और स्याही ख़तम हो गयी है
शाम होने वाली है
और एक दिन निकल गया है
फिर से ,
प्रेम में
कविता के प्रेम में ||

प्रिया मिश्रा :)

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जब कभी उदाश होना
तो वहाँ  जरूर देखना
जहाँ तुम कुछ कर सकते थे
लेकिन तुमने कुछ ना किया
क्युकी तुम मन से हारे थे
शरीर अभी भी जिन्दा था
और जीत सकता था ||

प्रिया मिश्रा :)

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