जब तक
हम गुलाम रहे

वाह -वाही
बहोत
कमाई

जब से
हाथ की
लकीरे बदलने  की
ठानी है

जमीं पे
बदमानी का
चादर लिए सोते है

ये चादर
मेरे पैर से
बड़ी है

सब देख के
राह बदल लेते है  

मैं नई राह
बना  लेता हूँ

मैं बदनाम
क़ाफ़िर हूँ

आसमान का
नीला रंग नहीं

लाल मिश्रित
कला रंग
ओढ़ के
सोता हूँ

मैं अब
रोज नई
लकीरे बनाता हूँ
 
और
रोज नई
कहानियाँ सजाता हूँ

मैं पत्थर सा
मैं ........
झरने सा
बह जाता हूँ

मैंने अपने पैरों
के निचे
लकीरे नहीं
खींची .....

मैं गिरता हूँ
रोता हूँ
संभालता हूँ
हस्ता हूँ
खुद पे

और फिर
नई लकीरे
बनाता हूँ ||

प्रिया मिश्रा :)) 

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