जब तक
हम गुलाम रहे
वाह -वाही
बहोत
कमाई
जब से
हाथ की
लकीरे बदलने की
ठानी है
जमीं पे
बदमानी का
चादर लिए सोते है
ये चादर
मेरे पैर से
बड़ी है
सब देख के
राह बदल लेते है
मैं नई राह
बना लेता हूँ
मैं बदनाम
क़ाफ़िर हूँ
आसमान का
नीला रंग नहीं
लाल मिश्रित
कला रंग
ओढ़ के
सोता हूँ
मैं अब
रोज नई
लकीरे बनाता हूँ
और
रोज नई
कहानियाँ सजाता हूँ
मैं पत्थर सा
मैं ........
झरने सा
बह जाता हूँ
मैंने अपने पैरों
के निचे
लकीरे नहीं
खींची .....
मैं गिरता हूँ
रोता हूँ
संभालता हूँ
हस्ता हूँ
खुद पे
और फिर
नई लकीरे
बनाता हूँ ||
प्रिया मिश्रा :))
"जीवन की आपा - धापी " जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये दो सिक्के जमीं पे गिर गए तो गम ना कर हाथो से वो , तेरा करीबी रिस्ता ना छूट जाये || बड़े मुश्किल से मिलते हैं दिल से हाल पूछने वाले तुझसे चाहने तुझे सराहने वाले कही इस आप - धापी में कोइ वो चेहरा ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आप - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || कोइ गुजर रहा होगा तेरे इन्तजार के पलों से वो तेरा यार ना रूठ जाये जीवन की आपा - धापी में वो तेरा प्यार का गुलिस्तां ना छूट जाये || थाम लेना उस हमदम के हाथो को तेरा हमकदम तेरा हमसफ़र ना छूट जाये जीवन की आपा - धापी में तेरी जमीं तेरा आसमान ना छूट जाये || तू नहीं कोइ खुदा कही तुझे ये गुमा ना हो जाये संभाल लेना खुद को इस चकाचौंध से की कोइ तेरा अपना अँधेरे में ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || प्रिया मिश्रा :)
Comments
Post a Comment