एक ख़त डाकियाँ एक ख़ाली पड़े मकान में डाल गया .................खत कुछ दिनों तक बंद पड़ा रहा  ........हवा उसे  इधर -उधर उड़ती रही .................फिर जोड़ की हवा ने थपड से उसे फाड़ दिया ...............पन्ना चीख कर .....फड़फड़ाने लगा ........और सारे घर में चीख के कह रहा था

माफ़ करना,,
मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ ||

ख़ामोशी हंस रही थी ...........पन्ना रो रहा था ........मिट्टी उड़ रही थी ... पन्ना गुजरते दिन के साथ  विरह में पीला पड़ रहा था ||

प्रिया मिश्रा :))

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