लोग बेश्याओ में अनेको ................पंक्तियाँ लिख देते है
मुझे जाने खेद है ...इस स्त्री समाज पे उठी हुई ऊँगली से .......ये इनपे लिखे हुए किसी भी तरह के व्यंग या उलाहना या गलत उदहारण से ....... मैं कोइ समाज सुधारक नहीं हूँ........... कोइ ग्यानी नहीं हूँ ...........नाही कोइ दार्शनिक हूँ .............एक स्त्री हूँ ...........इसलिए एक स्त्री का मन पढ़ सकती हूँ |

बेश्याए अपने आप नहीं बनती ..........मजबूरियां बनाती है |

माँ - बाप की मज़बूरी
प्रेम में धोखा
दहेज़ न मिलने पर घर से निकली गयी स्त्रियां या पति द्वारा त्रिस्कृत स्त्रियां
बाल्य्काल में चुरा ली गयी बच्चियाँ
बलात्कार ....

हमारे सभ्य समाज में .........दहलीज के बहार पाँव  रखते है .........हर लड़की बदल जाती है ....
वो दूसरे की बेटी
दूसरे की बहन
और दूसरे की पत्नी
और माँ होती है ...
शायद ये भी कारन है ....................बेश्यावो के जन्म का
और कई ऐसे मानशिक घाव होते है .........जो एक हस्ती खेलती स्त्री को बेश्या की उपाधि दिला देते है |
लेकिन ......बेश्या कभी भी अकेले कार्य नहीं करती इसमें हमारा सभ्य समाज भी शामिल है ..........जिसने सफ़ेद कमीज में जाने कितने कालिख छुपाये है |
अगर कोइ अपनी जिजीविषा के लिए कोइ कार्य करता है तो उसे घृणित नजर से ना देखा जाये | और अगर आप इसे घृणित नजर से देख रहे है तो इसमें बदलाव कीजिये ................
किसी भी स्त्री को वेश्या कहना खुद को गली देने जैसा है | क्योंकि हम सब इसमें सहभागी है ||

प्रिया मिश्रा :))  

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