“क्या बात है”?
 क्या बात है.?
 आज सीटी बज रही है
 दिल में उमंग है
 पाँव जमीं पर नहीं हैं
 क्या बात है ?
 
 कुछ बात नहीं 
बस ज़िंदगी जीने का
 सलीका सीख रहा हूँ
 बेबजह कैसे मुस्कुराऊँ
 वो तरीका सीख रहा हूँ
 सब तो वजह ढूंढ़ते हैं
 मै वजह तो नहीं ढूंढ़ता
 पर बेवजह भी नहीं रहता
 मैं रात की
 चांदनी में कल का
 सूरज देखता हूँ 
और 
कोई बात नहीं है मैं ...
 बस ज़िंदगी जीने के
 तरीके ढूंढ़ता हूँ।। 
 
 ये कमाल की बात है
 कल हँसा था 
वो याद नहीं
 कई साल पहले रोया था
 वो आज तक रो रहे हैं 
जो मिला था 
वो याद नहीं
 जिस से बिछड़े थे
 वो टीश आज भी उठती है
 कल क्या खाया था
 याद नहीं
 कब क्या नहीं खाया था
 वो टीश खाये बैठे हैं
 मैं इन सब समस्याओ को 
हवाओं में उड़ा के
 उस उड़ते धुएँ में
 मुक्ति ढूंढ़ता हूँ 
और कोइ बात नहीं है
 मैं बस पाँव रखने भर की 
जमी ढूंढ़ता हूँ।। 
 
 क्या बात है
 तुम तो आश्चर्य की सीमा से
 परे कोई धरती ढूंढ़ते हो
 तुम ग़ैरों की महफ़िल में
 करीबी ढूंढ़ते हो
 कैसे कर लेते हो
 तुम ये सब 
की पत्थर के शहर में
 शीशा ढूंढ़ते हो
 तुम आदमी हो की पायजामा
 फटी हुई जेब में 
तुम सिक्के ढूंढ़ते हो।।
 
 
 हां ! भाई बस ऐसा ही हूँ
 मैं
 मैं जंग लगी दीवारों में 
नवजीवन ढूंढ़ता हूँ
 मैं कीचड़ में कमल ढूंढ़ता हूँ
 बाकी सब ठीक है
 और कोई बात नहीं है
 मैं मुस्कुराने की वजह
 नहीं ढूंढ़ता हूं
 मैं मुस्कुराता चला जाता हूँ
 मैं अपनी राह बनाता 
मैं अपने गीत गाता चला जाता हूँ।।
 
 
 मैं आदमी हूँ
 मैं इंसानियत की
 दिखावे की भीड़ में
 आदमी ढूंढ़ता हूँ
 बाकी सब ठीक है 
मैं बेवजह ही सही
 यूं ही किसी सड़क के किनारे 
मिल जाये मैं वो आदमी ढूंढता हूँ
 समुन्द्र के खारे पानी से
 टकराकर उसके लहरों को
 छू के निकलते
 दूर किसी क्षितिज से
 और किसी और क्षितिज को 
छूते मैं इंद्रधनुष को ढूंढ़ता हूँ।।
 
 
 क्या बात है.? 
तुम तो हो बड़े अलबेले 
कैसे-कैसे ख़्वाब देखते
 कैसे-कैसे ख़्वाब बुनते हो
 तुम डूबते हुए दिन में
 शाम की लहर ढूंढ़ते हो
 तुम आदमी हो की पायजामा
 फटी हुई जेब में सिक्क्के ढूंढ़ते हो।।
 
 
 हां भाई !
 मैं ऐसा ही हूँ
 मैं जंग लगी दीवार में 
नवजीवन ढूंढ़ता हूँ।। 
प्रिया मिश्रा :))

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