ख़ाक से उठकर
गुल गुलिस्तां की
बारात सजा लेता हूँ
मैं आदमी हूँ
रह रह कर
अपनी औक़ात भुला देता हूं |
रात के अंधेरो में
मैंने ढेरो उदाश तारे देखे
मैं उन सभी उदाश
तारों को
समेट
अपना एक
मुस्कुराता चाँद बना लेता हूँ |
आधे से ख़्वाब टूटकर
जगा देते हैं
आधी रात को
मैं पूरी रात
उन आधे ख़्वाबों पे लुटा देता हूँ |
उन आधे ख़्वाबों पे लुटा देता हूँ |
मैं आदमी हूँ
रह रह कर अपनी औक़ात भुला देता हूँ ||
दरिया को समुंदर
और
समुंदर को दरिया बताते हैं लोग
मैं घर के बाहर
पैरों तले रौंदे
जमीं के घड़े में
कमल खिला देता हूँ
मैं आदमी हूँ
रह रह कर अपनी औक़ात भुला देता हूँ।।
प्रिया मिश्रा :))
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