जब छेड़ रहा था कोइ,, तुम्हे बसों में
तो उसके गालो पे तुम्हारे थपड़ के निशाँ दिखने चाहिये थे ||

जब तुम्हे कोइ अकेले रास्ते में देख
कमेंट कर रहा था ,,
तो उसके गालो पे तुम्हारे थपड़ के निशाँ देखने चाहिये थे ||

जब कोइ तुम्हे बीवी नहीं अपनी दासी समझ
बेते उठता था ,, तो उसके भी शरीर पे
उन बेतों के घाव दिखने चाहिये थे ||

नहीं दिखे उसी का परिणाम है
ये खबरे जो आये दिन आती है
कब से चला आ रहा है
कब से बिक रहा है
इन खबरों से अख़बार
जो नहीं बिकने चाहिये थे ||


प्रिया मिश्रा :)) 

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