बच्चो के बिकास में समाज और माता पिता का महत्व 

 


जब हम अपने बच्चों का लालन-पालन कर रहे होते हैं ... तब हमारे मन में क्या विचार आते हैं?........ हम किसका उदाहरण उनके सामने रख के उन्हें उसके जैसा बनने के लिए कहते हैं..? हमारी कौन सी गलतियों का उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ? टेलीविजन का हमारे बच्चों के जीवन में क्या महत्व है ? माता - पिता को कैसा होना चाहिए .. इसपे चर्चाएं क्यों नहीं होतीं ?.... हम बचपन समझ कर बच्चों की नासमझियों को अनदेखा करते हैं और बाद में उसका क्या परिणाम आता है .... घरेलू झगड़ों का बच्चों की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ता है ? ऐसी कौन सी बात है जो बच्चे हमसे नहीं कर पाते .? .. जिसपे चर्चा होनी चाहिए ?? हम सभी ने इन विषयों पर कभी नही सोचा है .. ना ही हम कभी सोचना चाहते हैं .. क्यों कि हम सभी व्यस्त हैं अपनी खोखली दुनिया में .... खुद को आधुनिक बनाने की होड़ में .. एक ऐसी आधुनिकता में जिसका दूर- दूर तक वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं है .. आधुनिकता का मतलब होता है ... आधुनिक सोच ... कुछ नया आविष्कार .... कुछ नयापन ..... लेकिन हमारे लिए आधुनिकता का मतलब है ..... एक दूसरे की गलत आदतों को अपनाना .. चाहे वो फिल्मों से गलत ज्ञान लेना हो ... या फिर पश्चिमी देशों से या फिर ... किसी किताब को पढ़ के उसका गलत मीनिंग निकाल कर ..

 

 और इस सबके कारण क्या हैं..?

 कारण बस इतना सा है की हमें पता ही नहीं है की बुनियादी शिक्षा क्या होती है ? बुनियादी शिक्षा का महत्व क्या होता है ... हमें बस किताबी ज्ञान का मतलब पता है और वह भी आधा-अधूरा .. हम गीता का ज्ञान देने में नहीं चूकते .. वो ज्ञान जिसका हमें खुद ज्ञान नहीं हम अपने ही बच्चों को झूठी तालीम देते हैं .. झूठ बोलना सिखाते हैं .. भृष्टाचार करना सिखाते हैं और फ़िर ये सब करने के बाद हम अपने बच्चों से उम्मीद करते हैं की वो हमारे साथ ऐसा नहीं करेंगे .. हम बच्चों को अपनी सुविधानुसार पालते हैं ... और पोषण करते हैं ये कहना गलत ही होगा ... कारण ये है की .. पोषण का मतलब ही विकास होता है .. और हमारे बच्चों का विकास तो हो ही नहीं रहा ... वो तो बस भीड़ में आगे कैसे निकलें ये सोचते रहते हैं ... और ये सोचने पे मजबूर करते हैं हम .. हम सभी इसके कारण हैं .. हमारी ये हर चीज को हर बात को प्रतिस्पर्धा के चश्मे से ही देखना इसका कारण है .. हमारी व्यस्तता इसका कारण है ... और कारण है हमारा दिखावापन .. ये सब आग हैं .. और हम है भट्टियां जिसमे हमारे बच्चे सिक रहे हैं ... लेकिन वो उफ़्फ़ नहीं कर सकते क्योंकि हमने उन्हें बच्चे की तरह नहीं एक गुलाम की तरह बड़ा किया है ... जहाँ सिर्फ बोलना तभी जरुरी है ... जब उनसे बोलने को कहा जाये ... नहीं तो उनको बागी घोषित कर दिया जाता है ... फिर शुरू होता है सामाजिक बहिष्कार का नाटक और फिर किस्सा ख़त्म ... ये लालन-पालन है या व्यवस्ता ... हाँ ! मैं तो इसे व्यवस्था ही कहूँगी ... क्योंकि इसे संचालित किया जाता है...

 

 सुधार कैसे किया जाना चाहिए ..?

 जिससे की आगे आने वाली पीढ़ियां संतुलित हो सकें .. उनमें प्रतिस्पर्धा का भाव ना हो .. हमारे बच्चे एक सुलझे हुए समाज के विकास में अपना योगदान दे सकें .. और हमारा उत्तरदायित्व पूरा हो सके .. क्योंकि बच्चे हमारा उत्तरदायित्व हैं .. हमारे चाकर नहीं .. अतः उन्हें ख़ुद संचालित न करके उन्हें ख़ुद चलना सिखाएं .. अपने बच्चों को गिरकर ख़ुद ही उठने का मौका दें .. बचपन में जैसे आप उन्हें चलना सिखाते थे .. वैसे ही उन्हें जिंदगी से भी लड़ना सिखाएं .. ये ज़रूरी है की .. हमारे बच्चे अपनी राह ख़ुद बनाएं और अपनी मंजिल ख़ुद तय करें .. हमें उनके लिए बाधा बनकर नहीं .. उनके साथ खड़ा होना चाहिए।। शिक्षा का महत्व बहुत है... शिक्षा को प्राथमिकता दें .. और उस शिक्षा में वेदों के ज्ञान को भी शामिल करें .. बच्चों को टेलीविजन से दूर रखें .. हो सके तो उन्हें फिजिकल वर्क में ज्यादा इन्वॉल्व रखें .. उनकी किसी अन्य बच्चे से तुलना ना करें .. अपने बच्चों के एक्स्ट्रा टैलेंट को पहचानें और उसपे कार्य करें .. उनके अंदर ख़ुद से कुछ नया करने की ललक पैदा करें .. उन्हें अपने इतिहास के बारे में बताएं .. वीरों और वीरांगनाओ के बारे में बताएं .. उन्हें कर्म का महत्व बताएं .. उन्हें धर्म की जानकारी दें .. अधर्म से लड़ना सिखाएं .. उन्हें उम्र के अनुसार हर उस क्षेत्र की जानकारी दें .. जो उनके विकाश में जरुरी हो .. उनके अंदर खेलों के प्रति भी रुचि पैदा करें .. देश में घटित हो रही हर घटना पर उनके साथ चर्चा करें और उनकी राय जानें .. उनको स्त्री पुरुष को तुलनात्मक दृष्टि से देखना न सिखाएं .. बल्कि दोनों का सामान रूप से सम्मान करना सिखाएं .. उनको स्त्री व पुरुष का महत्व समझाएं .. अपनी बेटियों को वेद ज्ञान की शिक्षा दें .. अपने कल्चर का ज्ञान दें .. अपने सनातन धर्म पर उनसे चर्चा करें .. बड़ों का आदर करना और छोटों से प्रेम करना सिखायें। अपने बच्चों को उनके बचपन से ही चीजों को साझा करना सिखाएं .. अपने बच्चो में लोगो के प्रति दया का भाव रखना सिखाएं .. उनके साथ बैठकर उनको वक़्त दें .. ताकि वो भी आपको वक़्त देना सीखें .. बच्चों को उनके ख़ाली समय में उन्हें कार्टून देखने की बजाए उस ख़ाली समय में कुछ नया व प्रेरणादायक करने की शिक्षा दें। और ये सब करने से पहले हमें खुद सज़ग होना पड़ेगा ताकि हम अपने बच्चों में ये सब खूबियां ला सकें।

 

 प्रिया मिश्रा :))

 

 

 

 

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