मैंम ,, आपने इतनी अच्छी पुस्तक लिखी है ....
राह का मुसाफिर ... इसमें आप क्या कहना चाहती है .... कुछ संछिप्त में बतायें...
जी जरूर ,,
इस कहानी में नाईका ने अपनी आप बीती लिखी है .... उसके ही शब्द दोहरा रही हूँ ....  

 


 मैं जब - जब अकेली खड़ी रही हूँ ... अपने लिए .. बहोत अकेलापन रहा हैं तभी ,, एक अकेलापन एक डर सताते रहता है ....अकेले व्यक्ति को .... मैं उस अकेलेपन से लड़ती हुई आगे बढ़ती रही हूँ ... लेकिन मैं फिर भी आस्वस्त करती हूँ ... उन सभी लोगो को ... जो आज मेरे साथ नहीं खड़े है की ... कभी जीवन में उन्हें मेरे साथ की जरुरत होगी ... मैं सदैव साथ रहूंगी ... क्युकी मैंने जाना है अकेलापन क्या होता है ... जब आप खुद से और बहरी लोगो से भी अकेले ही लड़ रहे होते है ... जब हर आने जाने वाला ... गली का कुत्ता भी भोकना चाहता है ... तब अकेले लड़ना क्या होता है .... मुझसे पूछे कोइ .. मुझे इन सब बातों से बस सिख इतनी मिली है ... ईश्वर के अलावा आपके साथ कोइ नहीं ... लोग आपको नकारने में एक सेकंड नहीं लगाते है ...
और अपराधी आपको ही ठहरा देते है..... ये मनुष्यो की प्रजातियां तब - तक आपको खोखला करती है .. जब तक उनका पेट नहीं भर जाता ... और उसके बाद ये फेक देती है .... ठीक वैसे ही  ... जैसे ये सड़क पे कचड़ा फेकती है ..... इन्हे किसी चीज का भय नहीं .... न ईश्वर का ना खुद की मरती आत्मा का ..... ये सिर्फ कलंक लगाना जानते है ..... समाज उसका भार कभी न लेता है ...  

 

बहोत बड़ा सामाजिक उत्तरदायित्व होता है ,, हमारा  अपने खुद के और समाज के निर्माड़ में ... लेकिन हम अपने ही सोचो के कारन उसे खोखला करते जा रहे है ... हमारे बच्चे ... हमारा परिवार हमारा उत्तरदायित्व है .... लेकिन हम उसे सिर्फ संचालित करना चाहते है .. अपने सोचो से नियंत्रित करना चाहते है .... साथ देना हमने सीखा ही नहीं है ||

प्रिया मिश्रा :))

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