उर्दू के अल्फ़ाज़ों को

 लफ़्ज़ों में लाने को ताउम्र

तरसते रहे एक करिश्मा सा हुआ

 और हम वहीं ठिठक से गए

 इश्क बन के आया उस्ताद

 हम लम्हा-लम्हा उर्दू सीखते रहे

 जब हुआ इश्क़ का आगाज

 तब अल्फ़ाज़ लफ़्ज़ों में 

आ गए ज़ज़्बातों में सिमट

 कर फ़सानों में पनप

 गए हंगामा न हुआ 

न कोइ शोर हुआ कमबख़्त

 इश्क़ पर किसका जोर 

था बस समझिये इश्क ही था

 उस्ताद और हम रफ्ता-रफ्ता

 उर्दू समझ गए।।

 

 प्रिया मिश्रा :))

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