जब कैकई ... अपनी ग़लतियों का पछतावा करती है
और कहती है....श्री राम से
हे ,, पुत्र लौट चलो अब
महल में ...
अयोध्या तुम्हारी राह तक रही ...
तब उनके इतना कहने भर से
क्या दशरथ स्वर्ग से वापस आ गए थे ?
या ,, जब भरत प्रभु
चले थे... नंगे पाँव
लेकर खड़ाऊं भगवान् का
तब उनके पैरों से जो लहुं
बहा था ,, उस लहुं से क्या
धूल गया कलंक
कैकई का...
ना ,, नहीं हुआ था ऐसा
ना... होगा कभी ऐसा
कैकई कल भी कलंकित थी
कैकई आज भी कलंकित है ||
प्रिया मिश्रा :))
"जीवन की आपा - धापी " जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये दो सिक्के जमीं पे गिर गए तो गम ना कर हाथो से वो , तेरा करीबी रिस्ता ना छूट जाये || बड़े मुश्किल से मिलते हैं दिल से हाल पूछने वाले तुझसे चाहने तुझे सराहने वाले कही इस आप - धापी में कोइ वो चेहरा ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आप - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || कोइ गुजर रहा होगा तेरे इन्तजार के पलों से वो तेरा यार ना रूठ जाये जीवन की आपा - धापी में वो तेरा प्यार का गुलिस्तां ना छूट जाये || थाम लेना उस हमदम के हाथो को तेरा हमकदम तेरा हमसफ़र ना छूट जाये जीवन की आपा - धापी में तेरी जमीं तेरा आसमान ना छूट जाये || तू नहीं कोइ खुदा कही तुझे ये गुमा ना हो जाये संभाल लेना खुद को इस चकाचौंध से की कोइ तेरा अपना अँधेरे में ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || प्रिया मिश्रा :)
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