कुम्भार के साँचे में
मेरा रूप नहीं
जलते आवे जैसा
ह्रदय है ,,
मैं ठहरी
मिट्टी की ढेर
ना सुन्दर हूँ
ना नदियों जैसी चंचल हूँ ||
आसमान की ताख से
आया एक ,,
सुनहरा परिंदा
कहता कुम्भार से रहने दे
ये नहीं कोइ
कुंदन काया ,,
इसे पानी सा बहने दे
ये मिट्टी की ढेर तेरी
गाँठ में मेरे बाँध के
जाने दे मुझे
उड़ने दे ,,
सुन वो ,,
कुम्भार
ये कोइ तेरी बर्तन नहीं है
न कोइ मूर्तिकार की
संरचना की ललचती
मिट्टी है ,,
ये ,, ना कोइ कवी की कल्पना
न कोइ मनुस्य की असाधारण सी
बुद्धि है ,,
ये है ,,
ईश्वर की
पैरो की धूल
कारन,, बस इतना रहा
ये तेरे साँचे सी ना दिखती है ||
प्रिया मिश्रा :))
"जीवन की आपा - धापी " जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये दो सिक्के जमीं पे गिर गए तो गम ना कर हाथो से वो , तेरा करीबी रिस्ता ना छूट जाये || बड़े मुश्किल से मिलते हैं दिल से हाल पूछने वाले तुझसे चाहने तुझे सराहने वाले कही इस आप - धापी में कोइ वो चेहरा ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आप - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || कोइ गुजर रहा होगा तेरे इन्तजार के पलों से वो तेरा यार ना रूठ जाये जीवन की आपा - धापी में वो तेरा प्यार का गुलिस्तां ना छूट जाये || थाम लेना उस हमदम के हाथो को तेरा हमकदम तेरा हमसफ़र ना छूट जाये जीवन की आपा - धापी में तेरी जमीं तेरा आसमान ना छूट जाये || तू नहीं कोइ खुदा कही तुझे ये गुमा ना हो जाये संभाल लेना खुद को इस चकाचौंध से की कोइ तेरा अपना अँधेरे में ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || प्रिया मिश्रा :)
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