कुम्भार के साँचे  में
मेरा रूप नहीं

जलते आवे जैसा
ह्रदय है ,,

मैं ठहरी
मिट्टी की ढेर

ना सुन्दर हूँ
ना नदियों जैसी चंचल हूँ ||

आसमान की ताख से
आया एक ,,
सुनहरा परिंदा

कहता कुम्भार से रहने दे
ये नहीं कोइ
कुंदन काया ,,
इसे पानी सा बहने दे

ये मिट्टी की ढेर तेरी
गाँठ में मेरे बाँध के
जाने दे मुझे
उड़ने दे ,,

सुन वो ,,
कुम्भार
ये कोइ तेरी बर्तन नहीं है

न कोइ मूर्तिकार की
संरचना की ललचती
मिट्टी है ,,

ये ,, ना कोइ कवी की कल्पना
न कोइ मनुस्य की असाधारण  सी
बुद्धि है ,,

ये है ,,
ईश्वर की
पैरो की धूल
कारन,, बस इतना रहा
ये तेरे साँचे सी ना दिखती है ||

प्रिया मिश्रा :)) 

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