तुझ सी पानी में बह जाती
तो हो आती मैं भी काशी धाम
अब कैसे जाऊँ मैं
जब पैर ही मेरे पाषाण

प्रिया मिश्रा :)   

 

चलो पुराने वक़्त को दफ़ा करते है
खुद से मिलके, कुछ वफ़ा करते है

कौन जाने कल का सबेरा कैसा होगा
चलो आज कुछ नया करते है

थोड़ी मटकी में माखन तू भी ला कान्हा
थोड़ी मिश्री मैं लाती हूँ

फिर खिलायंगे मिलके
जो मित्र तेरे - मेरे ,
इस जग में भूख से बिलखते रहते  है || 
प्रिया मिश्रा :)  


मैं जब भी तुम्हे प्रेम से देखूंगा
बस इतना देखूंगा
जितने में तुम शर्म से आखें झुका लो
और मैं मुस्कुरा के
उस पल को कैद कर लूँ अपने
दो आँखों में

प्रिया मिश्रा :) 


अब जब कभी मैं और तुम टकराएंगे
तुम रास्ते बदल लोगी
हो सकता है, खुद को स्थिर करने लगो
और जता दो की हम अब अजनबी है ||

मैं भी "तुम" नहीं कह पाउँगा
तुम्हे देख रुक जाऊंगा
लेकिन रोक नहीं पाउँगा
हम अब फासले लेके मिला करेंगे
वो बादल प्रीत के कभी ना आयंगे
अब धुप खिलेगी
जलाने वाली आत्मा को ||

प्रिया मिश्रा :)

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