संवाद
तुम अँधेरे में क्यों रहते हो
क्युकी मैं अँधेरे में ही पला - बढ़ा हूँ | ये तो मेरे माँ - पापा जैसे है | इसे नहीं छोड़ सकता |
तो फिर कुछ दिनों के लिए रौशनी की तलाश क्यों थी तुम्हे ?
सूना था की रौशनी महबूबा सी सुन्दर होती है | बस वही देखना था की अँधेरे से निकला हुआ आदमी कितनी देर तेज रौशनी में देख सकता है ||
फिर क्या मिला तुम्हे वहाँ जाके?
कुछ नहीं ,अँधेरे से और प्रेम हो गया ||
प्रिया मिश्रा :)
"जीवन की आपा - धापी " जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये दो सिक्के जमीं पे गिर गए तो गम ना कर हाथो से वो , तेरा करीबी रिस्ता ना छूट जाये || बड़े मुश्किल से मिलते हैं दिल से हाल पूछने वाले तुझसे चाहने तुझे सराहने वाले कही इस आप - धापी में कोइ वो चेहरा ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आप - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || कोइ गुजर रहा होगा तेरे इन्तजार के पलों से वो तेरा यार ना रूठ जाये जीवन की आपा - धापी में वो तेरा प्यार का गुलिस्तां ना छूट जाये || थाम लेना उस हमदम के हाथो को तेरा हमकदम तेरा हमसफ़र ना छूट जाये जीवन की आपा - धापी में तेरी जमीं तेरा आसमान ना छूट जाये || तू नहीं कोइ खुदा कही तुझे ये गुमा ना हो जाये संभाल लेना खुद को इस चकाचौंध से की कोइ तेरा अपना अँधेरे में ना ग़ुम हो जाये || जीवन की आपा - धापी में कही तू तेरा मकान ना भूल जाये वो शहर वो आसमान ना भूल जाये || प्रिया मिश्रा :)
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