मैं "मान" "स्वाभिमान" की बातें नहीं जानती
मैं तो बस इतना जानती हूँ
जो जन्म लिया है
तो मरना "निश्चित" है
इसलिए जब तक हूँ
हसना चाहती हूँ
हसाना चाहती हूँ
और मरने के बाद
मेरे माटी के शरीर में
एक बीज रोप देना
वो आएगा एक पेड़ बनकर
फिर खिलेंगे उसपे फूल
लोगो का उदाश ह्रदय महक जायेगा
और फल जब आएंगे
कुछ भूखे बच्चे होंगे तृप्त इस पेट की अग्नि से
फिर छाव भी देगा वो मेरा काया का पेड़
उसकी जड़ो में "कुछ" छोटे और नन्हे
पौधे भी आएंगे
ममत्वा भी तो चाहिए जीने के लिए ....
फिर होगा सफल मेरा सफर
पृथ्वी से अंतरिक्ष तक का .....
वरना तो सब बेकार है .....
सब मोह - माया है ....
प्रिया मिश्रा :))
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