जब भी कभी किसी को "उदाश" देखती हूँ सोचती हूँ
पूछ लूँ उससे उसके "उदासी" का कारन
एक "रोते" हुए व्यक्ति से उसके "आसूं" छीन लूँ
और "उपहार" स्वरुप "भेट" दूँ उसे उसकी  "मुस्कराहट"
फिर जाने क्यों "डर" लगता है
कहीं मैं ही ना "रुला" बैठु उसे
जो आँखों में "तेज़ाब" डाले बैठा है
ये  "मानव" व्यवहार बड़ा कठिन है
यहाँ "कब" कौन "शिकार "हो जाये
"कब" कौन "शिकार" कर जाये कुछ पता नहीं
बाकि सब तो मोह - माया है ||
  प्रिया मिश्रा :) 

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