संवाद
क्या हुआ था तुम्हे ?
कुछ नहीं सब कह रहे थे अवसाद था |
ये क्या बला है
ये वो बला है
जहाँ जिंदादिल लोगो को पाषाण बनाया जाता है
तुम्हे कैसे पता चला तुम्हे ये रोग है
रोग ना कहो मित्र " यही तो वो वक़्त था जब मुझे पता चला था की मैं जिन्दा हूँ "
फिर कैसे ठीक हुए ?
जब पता चला जिन्दा हूँ तो चलने लगा और जब चलने लगा तो खुद को ढूंढ़ने लगा फिर टकराया दवा से |
क्या थी दवा ?
मेरी खुद की सोच जो मैंने बदल ली |
कैसे सोच ?
यही की सब की कुछ किसी और के हाथ में है |
तो अब क्या सोचा है ?
यही की सब कुछ प्रभु के हाथ में है |
तो फिर तो फिर से तुम खाली हो गए ?
हाँ, लेकिन प्रभु ने विचारो को उठाने की और अपने विचारो की सुधारने की स्वतंत्रता दे रखी है | ओरो की तरह उंगलियों पे नचाते नहीं |
तो फिर अब क्या करोगे ?
कुछ नहीं बस उन लोगो को ढूंढूंगा और उनको सेवा में अपना वक़्त गुज़ारूंगा | एक बीमारी से मुक्ति उस बीमारी का बैध बन के ही मिल सकती है ||
समाप्त
प्रिया मिश्रा :)
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