पत्नी का पत्र

दूर कही जब
शगुन उठती है

मुझे याद आ जाता है
वो ब्याह का अपना दिन

कानो में पड़ती रहती है
ढोलक की वो आवाज

और फिर ,,
मेहँदी की खुसबू

हथेलियों में वो कथई  रंग

वो महावर की लालिमा
मेरे पैरो को
आज भी याद है
वो रंग

तुम्हारे घर में पहला
कदम ,,
घूँघट में थी मैं
वो चुन्नी लाल सी
और साड़ी पिले रंग वाली

जब गिरने को हुई
कितने संभलते हुए
संभाला था तुमने

मैं शर्म से
सिकुड़ गयी थी
सब हँस रहे थे  

अब तो वो सब पुरानी बात हो गयी
लोगो के लिए

हाथो की मेहँदी बालो में आ गयी
लेकिन ,, अब भी
वो युवती  ही
राह तकती है तुम्हारी

कहाँ बूढ़ा होने दिया तुमने
मुझे,,
आज भी तो
संभाल के मुझको
दिला देते जो
की मैं तुम्हारे लिए वही हूँ ||

दूर होक भी कितने पास हो तुम
क्या कहूँ,,
देखो ना
कितना बड़ा हो गया है
तुम्हारा सपना
अब करवट लेने लगा है
वो पेड़ जो लगाए थे हमने मिल के
वो अब सबको छाँव देने लगा है ||

सोचती हूँ
करा दूँ उसका भी ब्याह
किसी गुलदावदी से  
वो अपना कनेर जो बड़ा होने लगा है

तुम आ जाओ तो
अबके बरस,,
फिर से ढोल सुनूंगी मैं

तुम्हारे बिना
नहीं हो पता अब
कुछ भी ,,
खुद से संभलने की आदत नहीं है

पाँव लड़खड़ा जाते है अब
बच्चे कहते है
माँ बूढी हो चली है

लेकिन मैं इन्तजार करती हूँ
तुम्हारा ,,
वैसे ही जैसे
एक युवती करती है
श्रृंगार में डूब कर 

मेहंदी और महावर अब भी है
तुम्हारे इन्तजार में ||

प्रिया मिश्रा :)) 

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