मेरी आँखों से जो अश्रु बन के बह गया
वो समंदर का नमक हो गया
वो पहले से ही खारा था
स्वभाव उसका
उसके  अस्तित्व
में बदल गया
मैंने पैर धोये उस
समंदर में
फिर रेत में
अपने पैरो को साफ़ किया
अब रेत सने पैरो से
गंगा के पास आई
याचना की
माँ आई ,,
हमने उनसे
मुझे शुद्ध
करने की याचना की
वो सफ़ेद से जल में  

मातृत्व का दूध मिला के
मेरा अभिषेक करने लगी
एक शिशु की भांति
मैं बिलख रही थी
उन्होंने अपने स्नेह के आँचल में
समेट लिया  
और कहने लगी ..
प्रेम पाप नहीं होता

मैं क्या कहती
मैं चुप ही रही

फिर मौन तोड़ा   बोला
माँ ,, स्त्री का आँचल अगर मैला हो जाए
पिता का घर भी पराया हो जाता है

इस जग की क्या बात करू ..
ये तो छली है 
क्या आप समेट लोगी मुझे
मैं भी मीठा जल होना चाहती हूँ
मैं भी माँ होना चाहती हूँ ...

माँ मुस्कुराई ..
स्नेह से मुझे चूमा और बोली

स्त्री माँ ही होती है ..
उसके आँचल में प्रेम ही होता है सिर्फ

संसार का कोइ दाग उसे मैला नहीं कर सकता

मैं क्या कहती
मैं चुप रही
मैं चुप हूँ
मेरी हंसी
मेरा मौन निगल गया है ||

प्रिया मिश्रा :)   

Comments

  1. वाह वाह वाह बहुत सुन्दर

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  2. बहुत सुन्दर रचना

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