उर्दू के अल्फ़ाज़ों को
लफ़्ज़ों में लाने को ताउम्र
तरसते रहे एक करिश्मा सा हुआ
और हम वहीं ठिठक से गए
इश्क बन के आया उस्ताद
हम लम्हा-लम्हा उर्दू सीखते रहे
जब हुआ इश्क़ का आगाज
तब अल्फ़ाज़ लफ़्ज़ों में
आ गए ज़ज़्बातों में सिमट
कर फ़सानों में पनप
गए हंगामा न हुआ
न कोइ शोर हुआ कमबख़्त
इश्क़ पर किसका जोर
था बस समझिये इश्क ही था
उस्ताद और हम रफ्ता-रफ्ता
उर्दू समझ गए।।
प्रिया मिश्रा :))
https://www.youtube.com/watch?v=MoK-jzss_ak
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