अंधे , बहरे और गूंगे ||

हम अंधे हैं | हमारे सामने सबकुछ ख़राब होता जाता हैं | हम सिर्फ  देखते हैं | हम गूंगे भी हैं , हम बोल नहीं सकते, साहस नहीं हैं | और हम बहरे भी हैं | सच्चाई हमें कभी सुनाई नहीं देती हैं |  और इसमें प्रमाड   की आवशक्ता नजर नहीं आती मुझे | सबकुछ हमारे सामने हैं | काला  धुँआ , गंदे बिचार , सड़क पे बढ़ता ट्रैफिक और उस से बढ़ती बीमारिया | किसानो का मरना | खेतो में   जहरीले कीटनाशको का छिडक़ाव | मनुस्यो के शरीर में बिष फ़ैल गया हैं | और वो दिन प्रतिदिन दूषित होता जा रहा हैं | पेड़ काटने से लेकर,  मिलो के कचरे तक सब मनुस्य की अंधे आँखों का नतीजा हैं | बहरे इतने हो गए हम , हमें किसी की पुकार सुनाई नहीं देती | स्वार्थी इतने की सिर्फ खुद की बहनें दिखाई देती हैं बाकि की बेटियाँ नहीं | हमारे अंधे , गूंगे , और बहरे पन  से
सारी सृस्टि त्रस्त हैं | हमें कोढ़ लगा लगा हैं | अमानवीयता का कोढ़ | गुलामी का कोढ़ | स्वम के आगे कुछ नहीं दीखता हमें | जब शहर  में प्रदुषण फैलता हैं तब लोगो को पेड़ दीखता हैं | ट्रफिको के धुएं दीखते हैं | और पहले मनमानी दिखती हैं | जब आग लगती हैं तब हम पानी ढूंढ़ते हैं | ये हमारी आदत सी बन चुकी हैं | लोग मार दिए जाते हैं | हम बाद में जाके कैंडिल मार्च करते हैं | हजारो मोमबत्तियों से क्या वो किसी का गया वापिस आ जायेगा |
क्यों नहीं तब रोका जब अन्याय हो रहा था | एक रेपिस्ट अपने घर में मौज से सोता हैं | उसकी माँ बहने उसका आदर करती हैं | अगर यही माँ बहने ऐसे लोगो का घर से हो बहिस्कार सुरु कर दे तो कोइ पैदा हो नहीं होगा | वरना  रोज हजार होंगे  और लाख की संख्या में बेटियाँ मारी  जाएँगी | रोज चूल्हा ठंडा होगा और मनुस्यता जलेगी ||
मनुस्य खुद को नहीं पहचानता आश्चर्य हैं  |
दस अपराधी और दस हजार अच्छे लोग भी मिलकर उनका कुछ नहीं कर पाते | क्युकी हम सब गूंगे , बहरे और अंधे हैं | हम सब में दासिता का कोढ़ हैं | हम सब डर  गए हैं | और घरो में दुबके बैठे हैं | हम जिन्दा नहीं हैं हम मर गए हैं | जैसे पेड़ की डालियाँ काट दो वो कुछ महीनो में मर जाता हैं | वैसे ही हम मर गए हैं | हमपे किसी बातो का कोई असर नहीं होता हैं | और जो पेड़ फिर से उग आता हैं | उसे समाज की कुल्हाड़ी काट देती हैं |
बाद में मुर्तिया बनती हैं | बाद में माला  पहनाए जाते हैं | पहले अच्छे लोगो को अपमानित कर मारा जाता हैं |
तब जाके  कही  वो मारा हुआ आदमी मूर्ति के रूप में खड़ा हो पाता हैं |
वरना जीवित लोगो में ये जान कहाँ ? ये तो गूंगे , बहरे और अंधे हैं ||

जय हिन्द
जय भारत
प्रिया मिश्रा ||

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