उर्दू के अल्फाजो को लफ्जो में लाने को
ताउम्र तरसते रहे
एक करिश्मा सा हुआ
और हम वही ठिठकते से रहे
इश्क बन के आया उस्ताद
हम लम्हा -लम्हा उर्दू सीखते रहे
जब हुआ इश्क का आगाज
अल्फाज लफ्जो में आ गए
जज़बातो में सिमट कर
फ़सानो में पनप गए !!
हंगामा न हुआ न कोइ
शोर था
कम्बखत इश्क पर किसका जोर था
बस समझिये इश्क ही था उस्ताद
और हम रफ्ता - रफ्ता उर्दू समझ गए !!
प्रिया मिश्रा

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