सुनो बचा लो
पृथ्वी ...
मना लो उत्सव
जाने कब तक
प्रकृति का श्रृंगार
रहेगा .....
जैसा मानव-युग
आया है .....
कुछ छण
थामेंगी ... खुद को माँ
फिर काली
का अवतार होगा
और
चहुँओर सिर्फ
तांडव रहेगा .....
ये वक़्त बड़ा मनोरम है
अभी धुप -छाँव
दीखते है ..
लेकिन ,,
जैसा मानव -युग
आया है ...
अब मानव प्रकृति का
कोइ मेल नहीं ...
अब तो बस अन्धकार होगा
सुनो मानव ..
अब तक तुम
खेल लिए माँ के
आँचल से ...
मैले किये
बहोत तुमने
उनके आँचल को
अब प्रकृति के
द्वारा ...तुम्हारा
तिरस्कार होगा
प्रिया मिश्रा :))
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