मेरा कोइ शहर नहीं है
मैं हर शहर का
बाशिंदा हूँ .....
मैं आवारा सा बादल
मैं .............उड़ता सा पंछी
मैं हर नदी को
छूटा किनारा ...
मेरा कोइ शहर नहीं है
मैं हर शहर का
बाशिंदा हूँ
मैं नहीं रहा कभी
भेड़ो के चाल में
मैं एक आवारा परिंदा हूँ
किस भेद को
लेके जायेंगे
किस भेद को लेके
रहना है ........
जो मिट गया वो भी अपना था
या पराया ....
खबर नहीं .....
जो है
वो भी जाने किसका है ....
मुझे कुछ खबर नहीं
मैं मरा हुआ हूँ की
ज़िंदा हूँ
मेरा कोइ शहर नहीं है
मैं हर शहर का
बाशिंदा हूँ .....
प्रिया मिश्रा :))
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