मैं भटक चुकी हूँ
जब मैं शान्त खड़ी थी ,, उस समंदर के किनारे
जो एक शहर को दो भागो में बाँटता था
एक शहर चमक -दमक वाला
और एक अँधेरी गली में हुआ करता था
तू निकला चमक वाले शहर का
मैं ठहरी अँधेरी गली की
बता हम कैसे मिलेंगे
तुझे ,, पहचान है रास्तों की
तो अब की दुरी तू तय कर
मैं भटक चुकी हूँ ||
मैं भटक चुकी हूँ
कही इन अँधेरी गलियों में
ये समंदर भी उफान पर रहता है
मेरी आवाज तुझ तक जाती है
तो ,, अब की दुरी तू तय कर
मैं भटक चुकी हूँ ||
मेरा हाथ तुझ तक पहुच नहीं पाता
मेरी बात तुझ तक पहुँच नहीं पाती
तेरे शहर में शोर बहोत है
मैं बस ,तेरे से दो फैसले पर जो
शोर करता समंदर पड़ा है
वहां खड़ी हूँ
इन्तजार कर रही हूँ
तो अब ,, तू दुरी तय कर
मैं भटक चुकी हूँ ||
ये चाँद भी लगता है
तेरे शहर का अलग सा है
मेरे शहर का अलग सा हैं
नाम बाँट के ये भी
तेरे शहर में पूर्णिमा सा चमकता है
मेरे शहर में अमावश सा छुपा रहता है
सितारों की बात क्या करू
ये तो निकलते ही नहीं
लगता है ,, तेरे कदमो संग लिपट कर
ये भी आसमान से विदा हो गए
मेरे शहर से लापता हो गए
मैं इन शरद रातो में
ऐसे ,,जैसे
पानी बर्फ सा जमा पड़ा हो
मैं नहीं बढ़ा सकती मेरे कदम
मैं कैद हूँ
तो ,, अब तू दुरी तय कर
मैं भटक चुकी हूँ ||
हो सकता है
तेरे चमक वाले शहर में
तेरा मुक्कदर अलग सा हो
मेरे अँधेरे शहर में मेरा मुक्कदर अलग सा हो
तेरे मुक्कदर में
मंजिले लिखी हो
मेरे मुक्कदर में तू लिखा हो
तुझे लगे की ,,
कही तुझे मेरी जरुरत है
तुझे भी महशुस हो वो कमी
जो मैं महशुस करती हूँ
तो कदम बढ़ा
थोड़ा आगे है
ये हमारे शहर को बाँटता
तेरे शहर से लगा समंदर
मुझे बढ़ने नहीं देता
मैं इन्तजार में हूँ
तो ,, अब तू दुरी तय कर
मैं भटक चुकी हूँ ||
जिन रातरानी की कालियों को बटोर कर तू
समेत लेता था अपने हाथो में
और कहता था की
चुम लो इसे तुम
मैं मुस्कुराती
तुम्हे पागल बुलाती
तुम कहते
तेरे होठो के सबनम से
ये भींगी रहेंगी
कल सुबह ये ज़मीन पे नहीं
मेरी हथेलियों में खिलेंगी
तुझे इतनी मोहब्बत थी मुझसे
जो सिद्दत से फूल समेट लेते थे
अपनी हथेलियों में ,,
तो आज फूल भी बिखरे पड़े है
मैं भी टूटी पड़ी हूँ
मैं चल नहीं सकती
तुझे तेरे फूल पुकार रहे है
तू चला आ
एक कदम बढ़ा
तेरे शहर में बड़े काटों वाले पौधे है
मेरे आँचल कमजोर सा उलझ जायेगा
मैं इन्तजार में हूँ
तो ,, अब तू दुरी तय कर
मैं भटक चुकी हूँ ||
तू कहता था की तू दौड़ आएगा
मेरी आँखों में तुझे आसूं नहीं अच्छे लगते थे
अब तो हाल ऐसा है
रात भींगी रहती है
सूरज डूबा रहता है
मेरे शहर में तेरे बिना
मातम सा बना रहता है
ये बस तुझे - मुझे बाटने वाला
समंदर ही शोर करता है
और शोर करती है वो सारी चीजें
जो बाधा है
तेरे -मेरे मिलन में
ये चमेली के बेल जो तुमने लगाए थे
इसकी लताओं में काटें आ गए है
नहीं तो बांधती मैं इन्ही से पूल
और पार हो जाती समंदर
लेकिन मेरे पाँव भी
लहुं -लुहान पड़े है
चल मरहम लगाने को ही सही
जरा सी खुसबू तेरी ला दे
मैं इन्तजार में खड़ी हूँ
अब तू दुरी तय कर
मैं भटक चुकी हूँ ||
प्रिया मिश्रा
वाह
ReplyDeletethank you ji
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