वृद्धाश्रम 

मैं वृद्धाश्रम हूँ

 चार ओर से दीवारे हैं मेरे

 आगे मेरे बड़ा सुन्दर हरा भरा खुला मैदान है 

मैं अपने आप को बड़ा खुशनसीब मानता हूँ

 मैं रोज माँ का आँचल छू के

 उन्हें प्रणाम करने का सौभाग्य पाता हूँ

 बाप की ऊँगली पकड़ कर खड़ा हूँ

 मैं वृद्धाश्रम हूँ 

मैं निर्जीव हूँ

 पर संवेदनशील हूँ

 

 

 हजारों माताओं का 

आशीर्वाद प्राप्त है मुझे 

हजारों के सपने जुड़े हैं मुझसे

 मेरे तो कण-कण में माँ-बाप बसते हैं

 

 इसलिए मैं जर-जर नहीं हुआ मैं बेटा हूँ

 हजारों का इसलिए मैं जवान हूँ

 मेरे कंधे मजबूत हैं मैं वृद्धाश्रम हूँ

 मैं निर्जीव हूँ

पर संवेदनशील हूँ 

 

 जब कोइ माँ रोती है 

अपनों के लिए मेरा कलेजा फटता है 

मैं चीखें मारता हूँ 

मेरी भी आवाज उनके साथ गूंजती है 

और मेरी दीवारों में दरारें आ जाती हैं

 वे मेरी कमजोरी नहीं मेरी मजबूती हैं

 वे मेरी लहू में दौडता दूध हैं 

जो मुझे चुकाना है

 इसलिए मैं मज़बूत हूँ

 मेरे कंधे श्रवण के कंधे से भी मजबूत हैं

 इसलिए मैं जमीं से जुड़ा हूँ

 मैं वृद्धाश्रम हूँ 

मैं निर्जीव हूँ 

पर संवेदनशील हूँ 

 

 

 मैं अपनी माताओं का लाल हूँ 

मैं अपने पिताओं की लाठी हूँ

 मुझमे वो बसते हैं

 उनमे मैं बसता हूँ

 मैं वृद्धाश्रम हूँ

 मैं निर्जीव हूँ 

पर संवेदनशील हूँ 

 

 मुझमें बुढ़ापा मुस्कुराता है 

मुझे माँ प्यार से रोटियां खिलाती है

 मुझे प्यार से लोरियां सुनाती है

 कल मेरे एक पिता ने मुझमें हरियाली उगाई

 एक पेड़ लगाया अब मेरी छत पे छांव रहेगी 

कड़ी धूप से एक पिता ही बचा सकता है 

एक माँ का आँचल ही 

अपने बच्चे को सवांर सकता है

 आज थोड़ा दुःखी हूँ मैं 

पर ख़ुश भी हूँ 

दुःखी इस बात से हूँ 

की 

मेरी एक माँ आज जा रही है

 और ख़ुश इस बात से हूँ

 की

 उसको मेरे जैसा एक बेटा मिल गया 

वो ख़ुश हैं बहुत ख़ुश हैं

 और मैं माँ की

 खुशी में ख़ुश हूँ 

मैं वृद्धाश्रम हूँ 

निर्जीव हूँ 

पर संवेदनशील हूँ

 

 मुझमें ममता बसती है 

मुझमें पिता का स्नेह बसता है 

मुझमें आशीर्वाद बसता है

 मुझमे आत्मा बसती हैं

 हजारों माताओं की हजारों

 पिताओं की उनकी आह!

 की

 उनकी तड़प बसती है 

उनका प्यार बसता है

 मुझमें पूरा एक संसार बसता है

 मैं वृद्धाश्रम हूँ

 मैं निर्जीव हूँ

 पर संवेदनशील हूँ 

 

 पिछले साल मेरी एक माँ का

 

 साया मुझसे छूट गया

 वो प्यार का आँगन आज तक उदास है

 सोचता हूँ कैसे होंगे

 वो निष्ठुर मनुष्य जो जीवित तो हैं 

पर निर्जीव हैं

 उनमें कोई भाव नहीं दूध का उबाल नहीं

 वो किसी के लाल नहीं वो मशीन हैं 

वो किसी की संतान नहीं

 उनमें भावनाएं नहीं

 उनमें लहू नहीं वो 

जन्मे तो हैं पर निर्जीव हैं

 वो मनुष्य हैं

 पर संवेदनशील नहीं

 मैं निर्जीव हूँ

 मैं मनुष्य नहीं हूँ

 मैं वृद्धाश्रम हूँ 

पर संवेदनशील हूँ ||

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