मुझे रात की तरह ढलना नहीं आता
मैं सुबह की तरह खील ही जाती हूँ
मैं चाँद की तरह खूबसूरत नहीं
जिसपे कई शायरों ने शायरी लिखी है
मैं सुबह की मीठी धुप हूँ
जिसपे कवी कविता लिखते है ||
प्रिया मिश्रा :)
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बजाये गए है ढोल
की आबादी बढ़ गयी है
किसी ने ये खबर ना जानी की ,
किसान कंगाल हो गया
गावँ बदहाल हो गया
तभी तो शहरो का ये हाल हो गया
लोग नहीं बढे है
लोग खुले आसमान से निकल कर
एक कमरे में बंद हो गए है
कमरा छोटा है
सोच छोटी करते जा रहा है ||
प्रिया मिश्रा :) 
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आदमी  "आदमी " से बचने के लिए
राक्षस होते जा रहा है
इसलिए समाज परिवर्तित होते जा रहा है |
रहेगा ना पानी तो खून पी जायेंगे
ये अपने बगल वाले बचाने कभी ना आयंगे
बचना है तो जंगल के टेढ़े पेड़ हो जाओ
नहीं बचना है तो जंगल ढूंढ रहा है
सीधे पेड़ो को
साफ़ पानी को
और हवा की सुगंध को
प्रिया मिश्रा :) 
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तेरे पैरो के महावर का लाल रंग
मेरा उगता हुआ सूर्य है, सुबह का  ||

प्रिया मिश्रा :) 


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