मैं कभी कह ना पाया की
तुम कैसे हो
आज कहना  चाहता हूँ
जैसे सुबह की चाय
और रोज की खबरे होती है
मेरे लिए,
तुम तुम वैसी हो,
फर्क बस इतना है
तुम चाय सी मीठी
और एक अच्छी काल्पनिक खबरों की तरह झूठी हो ||
तुम सुबह के खिली धुप
और दोपहर में सुना
आसमान सा हो
तुम पीतल दिखाती हो खुद को 
लेकिन तुम बिलकुल खरा सोना सा हो ||
तुम मेरे सुबह की नास्ते की तरह
जिससे मैं लेके, ऊर्जावान महसूस करता हूँ
तुम मेरी दोपहर की रोटी हो
जिसमे घुल जाती है
चासनी वाली मीठी
चटनी जब तुम मुस्कुराती हो
और तीखा सा लगता है वो सरसो का साग
जब तुम आँखे दिखाती हो 
तुम मेरे लिए
थोड़ी खट्टी , थोड़ी मीठी
थोड़ी तीखी भी हो ||
तुम शाम में आती राहत की तरह हो
तुम ग्रीष्म की छुटियों की तरह हो
तुम मेरे लिए सावन की हरी चूड़ियां
तुम बारिश में भींगता मौसम
तुम जेठ की कड़ी दोपहरी
में रात की सीतलता का इन्तजार हो
तुम एक ही हो
जिस में बस्ता मेरा पूरा संसार हो
मैं नहीं लगाना चाहता
फेरे दुनिया के
आओ तुम्हारे सात फेरे फिर से लगा लूँ
मेरे बिश्व भ्रमण  पूरा हो ||
प्रिया मिश्रा :)

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