कुरुक्षेत्र ( एक इतिहास )

बचपन से ही पांडवो ने झेला था एक श्राप
लेकिन एक वरदान भी मिला था
केशव का साथ

दुर्योधन की मूर्खता
और शकुनि की निति
या कहे भाग्य की अनीति
सब था पांडवो के मार्ग में
एक पर्वत की तरह

झेल रही थी कुंती भी
अपनी करनी का एक श्राप
कर प्रसन्न  जो सूर्य देव को
मांग लिया वरदान
तनिक भी बिश्वाश नहीं था
उसे , जो मिला था उसे वरदान
प्रसन्न  सूर्यदेव ने
दे दिया एक पुत्र
बड़ा होकर वो बना
दुर्भाग्य वस सूतपुत्र

लेकिन कहाँ सूर्य का तेज
वो बालक छुपा पाया था
जो आगे चलकर कर्ण कहलाया था
ललकारा था उसने अर्जुन को
भरी सभा में
तब द्रोण आगे आये थे
जैसे ठगा था उन्होंने
एकलव्य को
वही वाणी लाये थे
अर्जुन उनका शिस्य था
उन्हें पता था
एक म्यान में दो तलवार नहीं ठहरते
एक युग में दो अर्जुन नहीं सवरते |
तब बढ़ के आगे दुर्योधन आया
वो नहीं सुयोधन था
वो तो बस दुर्योधन था
लगा लिया लिया मोल
एक भले मानस की
लाचारी का
बिक गया कर्ण
लग गया मोल
अब वो कर्ण ना रहा
अंग राज हो गया
समाप्त अब
स्वराज हो गया
वीर दाश हो गया
ये भी एक इतिहास हो गया |

कुण्डल कवच देख कुंती पहचान गयी थी
लेकिन लाज बचाये
एक माँ खड़ी  थी
छः पुत्रो की माँ माता
मान - अपमान को संजोये
आँखों में
अश्रु को
सजाये नैनो में
अब वो
अब वो जान गयी थी
बिधाता का न्याय ही यही था
सूर्य का तेज
पलना - बढ़ना कही और था
शीश झुकाये
वो कर रही थी नमन
दे रही थी आशीर्वाद
और दे रही थी धन्यवाद
जिसने पाला था
उसका लाल
वो होगी कोइ
नारी अनमोल
मैं नहीं उसकी
अंगूठे जितनी भी ममता रखती
मुझमे कहाँ थी इतनी शक्ति
कहाँ मैं मान पाती इतना
कहाँ से लाती साहस इतना
चलो अब मन की थकावट दूर हुई
मेरी प्राथना भी मंजूर हुई
शाम ढल गयी
कहानी वही रुक गयी
अर्जुन - कर्ण
युद्ध उधार रहा
वक़्त फिर से बलवान रहा ||

शकुनि बड़ा  चतुर था
उसने की एक और चतुराई
लक्षया गृह की योजना बनाई
कह उठा वो महा पापी
दुर्योधन तुम मुकुट
सम्भालो , अपनी गद्दी निकट ही जानो
अब जायेंगे पांडव स्वर्ग को
उनकी गति तुम निकट ही जानो
चले पांडव लक्षया गृह को
आग एक और लगनी थी
धु - धु कर के जल उठा
एक हुए थे शिकार
पांडवा , उनके अंदर भी आग लगी
साम्राज्य का इतना लालच
भाई - भाई को खायेगा
ऐसा कलयुग आएगा
ये कहानी महाभारत गढ़ गया
लो अब परंपरा चल उठी
जब लहू - लहू को
काटेगा ,
फिर से इतिहास जागेगा ||


शुरू हुई अब नई कहानी
अब पांडव वन - वन भटके
जितना भटके
उतना पके
जितना पके
उतना सम्भले
जितना सम्भले
उतना उनका उद्धार हुआ
तभी तो केशव को उनसे प्रेम हुआ
अब बारी थी
नारी की
 पत्नी धर्म की परीक्षा की
लो जन्म के आई
अग्निसुता
द्रोपदी जो कहलाई थी
स्वंवर एक रचा गया
द्रोपदी के वर पुरे होने आये थे
नियति ने पांडव बुलाये थे
एक - एक कर के यौद्धा आये
लेकिन कहाँ किसी ने जाना था
वीर हमेसा नमन करता
तब धनुष भी उठा करता
बारी  कर्ण की
लेकिन वो कहाँ
द्रोपदी पति कहलाना था
नियति को कोइ और ही
इतिहास बनाना  था
फिर उसका अपमान हुआ
 सूतपुत्र से सम्म्मान हुआ
ललकार उठा कर्ण
सभा को ,
कह गया शब्द
उस उगती आभा को
द्रोपदी स्वम्बर
अधूरा ही रह जायेगा
वरमाला भी सुख जायेगा
तब आया व्राह्मण वेषधारी
अर्जुन , कुंती पुत्र ने
लगा दी ध्यान
मछली की आँख में
ले आया वो द्रोपदी
भरी सभा से
लेकिन ना कर पाया वो
एक नारी का मान
माँ से कह गया परिहास
द्रोपदी के हो गए कई भाग
एक भाग युधिष्ठिर को
एक भाग भीम को
एक भाग  अर्जुन के हिस्से
बाकि बट गए नकुल और सहदेव को
पांचाली सच में हो गयी
पांच पुरुषो की नारी
नियति ये भी न्यारी थी
एक ही नारी सबकी प्यारी थी ||

चल एक और खेल नियति का
अब द्युत क्रीड़ा की बारी  थी
शकुनि ने फेका एक पासा
हार गया युधिष्ठिर का धर्म
जब सब हार गए युधिष्ठिर
लगा दिया कुल का मान भी दाव पे
लग गयी द्रोपदी
पुरषो के भाव पे
बिक गयी वो
अत्याचारी हाथ
बन गयी दासी
राजकुमारी और रानी था
जिसका सम्मान
भरी सभा में कुलवधु
उघारी , दुशासन   खींच रहा था साड़ी
हां - हां करती पापी हँस  रहे थे
सभा फिर भी मौन खड़ी थी
सब अंधे हो गए थे
सब बहरे हो गए थे
बोलता हुआ साम्राज्य चुप था
नारी अश्रु बह रहे थे
तब रखी केशव ने
राखी का मान
खींचते - खीचते कुलवधू का मान
ढेर हो गया वो पापी अभिमान
श्राप अब सभा को लगी
जो सभा मौन थी
वो मौन ही हो गयी ||
मत लेना नारी का श्राप
कह रहा चीख के इतिहास

अब एक नई कहानी नियति ने रच डाली
महाभारत का बिगुल बज उठा
सब रथी - महारथी
सजे - धजे खड़े थे
अर्जुन लड़ने को त्यार नहीं
अब क्या होगा
जब पांडव का यौद्धा ही
सजग नहीं
कृष्ण तब अर्जुन को मार्ग दिखाते है
हे अर्जुन ये कर्म है तुम्हारा
अर्जुन भर्म में पड़ा हुआ
कैसा कर्म केशव
मुझे नही चाहिए
कोइ साम्राज्य
ना ही कोइ बैभव
किसपे धनुष उठाऊ मैं
उस आचार्य पे जिन्होंने मुझे
धनुष उठाना सिखाया
या उस पितामह पे जिन्होंने कई बारी
मेरी सारी गलतियों की कालिमा को
अपने स्वेत वस्त्र में छुपा लिया
या उन १०० भाईयो में
जो मेरे संग बड़े हुए
किसपे धनुष उठाऊ केशव
कृष्ण कहते पार्थ
अभी युद्ध तुमसे तुम्हारे
अपनों का नहीं है
धर्म - अधर्म का युद्ध है
तुम्हे योद्धा के रूप में खड़ा किया गया है
तुम निमित मात्र हो
रचनाकर तो मैं हूँ
सब मुझसे ही सुरु हुआ
मुझमे ही समां जायेगा
तुम बस कर्म करो
और कुछ मत सोचो
चलो धनुष उठावो
अब प्रहार करो
ख़त्म हुआ गीता उपदेश
चला अब अर्जुन का बाण
साढ़े साधे अपने लक्ष्य को
ले रहा वो बड़ा बेग
धीरे - धीरे सारे
यौद्धा वीरगति को प्राप्त हुए
लेकिन पांडव जीवित रहे

कर्ण का कुण्डल कवच
दान चढ़ चूका था
कुंती माता धर्म जता कर
चार पांडवो के प्राण बचा लाई थी
एक अर्जुन
एक कर्ण
दोनों में से कोइ एक ही रहना था
लेकिन माँ के ह्रदय में था दोनों का वाश
माँ करती रही विलाप

बारी आए चक्रब्यूह भेदने की
अर्जुन को ललकारा था
लेकिन काल अभी उसका नहीं
उसका था जो अर्जुन का प्यारा था
अभिमन्यु कृष्ण का शिस्य
त्यार हुआ भेदने को
वो चक्रब्यूह
जो पाप के ढेर से बना था
प्राप्त हुआ वो वीर गति को
इसमें सब नयाई
अन्याई हो गए
एक निहथे बालक पर
कई कायरो ने वार किया
बड़े - बड़े योद्धा थे
कर्ण और वो पितामह
कर्ज में डूबे दुर्योधन के
पापा पर पाप करते गए
एक कर के सब ने
ले ली एक महानायक की जान
फिर भी वो रह गए पापी
अभिमन्यु बना महान

बारी आई कर्ण की
आज दो तलवार टकराये थे
अर्जुन और कर्ण आमने - सामने जब आये थे
तीर पर तीर
एक से बढ़कर एक वीर
अर्जुन और कर्ण दोनों डटे रहे
लेकिन गुरु श्राप कर्ण को खा गया
कर्ण का पाप भी प्रायश्चित को आ गया
भूल गया वो ब्रम्हास्त्र का  मंत्र
और आया काल के समीप
दे गया वो ऋण मित्रता का
लेकिन दे गया एक और वो सिख
ना लो दया की भीख
वो भीख ही खा जायेगा
जब देने वाला खरीद लेगा तुम्हे
कही न कही तो तुम्हारी बोली लगाएगा
वो लेगा मोल
अपने शब्दों का
और तू मारा जाएगा
ख़त्म हुई एक और कहानी
मारा गया वीर वो ग्यानी ||

मारे गए निनानवे भाई
पितामह
मित्र
मामा और
अपने ही के हाथो
ये बड़ा काल आया था
जिसने बड़ी संख्या में विरो को खाया  था
अब दुर्योधन रह गया अकेला
लेकिन वो इतना हटधर्मी था
माना नहीं वो
गदाधारी
मति मारी गयी थी
उसकी भी बलिहारी
आखिर कर मारा गया वो भी
ख़त्म हुई एक और कहानी
उजड़ गयी गोद
गांधारी की
एक था कुंती का भी लाल
धरती रक्त पी के शांत थी
नारी अपमान देखने वाली सभा अब मौन हो चुकी थी
लेकिन कहानी चलती रही
पात्र बदल गए
अब भी महाभारत जारी है
कटते हैं अब भी सीस
और हारी अब भी नारी है

रहने दो अब कुछ सत्कर्म करो
इतिहास को नमन  करो
 धरती फिर प्यास बुझाएगी
जब बात नारी की आएगी
तो रहने दो पुरुष का अहम्
रहने दो साम्राज्य का लालच
रहने दो जीत की ईक्षा
कर लो एक बार
कुरुक्षेत्र की समीक्षा

जब - जब धर्म की हानि होगी
तब - तब योद्धा जागेगा
लहू - लहू से टकराएगा
और इतिहास बनाएगा
तो सपथ लेलो
उस इतिहास की
कसम तुम्हे मानस ज़ात  की
 अब धर्म पे आ जाओ
कल का इतिहास मत दोहराओ |

प्रिया मिश्रा :)

Comments

  1. मै सहमत नहीं हूं इससे

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  2. aap kaaljaee ho :) aap sahmat ho bhi nahi sakte :) jao ho
    padhne ke liye sukriyaa :)

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