मैं जब मिट्टी को समर्पित हो जाउंगी
मुझमे एक बीज रोप देना
मैं जीना चाहती हूँ
सेवा भाव से
लेकिन बिना कुछ कहे ||

प्रिया मिश्रा :)

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मैं मरते - मरते भी एक कहानी लिख जाउंगी
ये यकीं है मुझको

अपनी शब्दों को कुछ और  नया रूप दे पाऊँगी
ये यक़ीन है मुझको ||

मेरे नाम से भी मेरा शहर जाना जायेगा
जाते - जाते कोइ नया नाम दे जाउंगी
ये यक़ीन है मुझको ||

मेरे कविताओ में मेरे शहर का बरसात होगा
खुसबू उसकी मिट्टी मेरे पन्नो पर
इत्र की तरह महकते रहेंगे
यकीं है मुझको ||

शाम का सूरज
रात के तारे  सबकुछ  देखेगा
सब कुछ चमकेगा
मेरी कविताओ में
मेरा शहर मेरा घर दिखेगा मेरी कविताओ में ||

मैं एक अजनबी शहर में
अपने शहर को ले जाउंगी
ये यकीं है मुझको ||

मैं मरते - मरते भी एक कहानी लिख जाउंगी
 ये यकीं है मुझको ||

प्रिया मिश्रा :)

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