बेटियाँ , बेटियाँ  ही क्यों रह जाती है ??
बहुएँ क्यों नहीं बन पाती ??
सास - ससुर माँ - बाप क्यों नहीं बन पाते ??
बेटा कौन सा चोट खाके घुटता रहता है ??
ऐसा कौन सा लालच है जो सिर्फ अधिकार मांगता है धर्म नहीं सीखा पाता ?
ऐसा कौन सा प्यार है जो बुढ़ापे तक नहीं जाता ?
मकान घर की ओर रुख क्यों नहीं लेते ?
ईंट - पत्थर अब सिर्फ इमारते क्यों बनाते है ?
क्यों माँ - बाप विर्धाश्रम जाते है ?
जिनका पूरा परिवार हो वो अकेले क्यों रह जाते है ?
ये मैं नहीं पूछ रही , कई सालो से खड़ा वो विर्धाश्रम पूछ रहा है | जो हमें हमारे ही मुँह पे चिढ़ाता है और कहता है तुम भी यही के लिए बने हो थोड़ा हड्डियों को कमजोर होने दो | अभी तुम्हारे हाथ में लाठी नहीं है , इसलिए कोइ ना कोइ साथी है ||
बिर्धाश्रम एक ऐसा सच है एक शूल की तरह चुभता है क्युकी सबको अपना भविस्य वही दीखता है | फिर भी हम गलतियाँ कर जाते है | इंसानियत नहीं सिख पाते |
कारण बहोत है
१) माँ - पिता  का अपने कार्यो में व्यस्तता
हमारे माता - पिता को कभी फुर्सत नहीं मिलती हमें सही - गलत बताने की | वो समझते है , उम्र के साथ सीख जायँगे और हम सोचते है हमने जो सीखा वही उचित है | जहाँ संवेदनाये मर जाती है | और एक घटना क्रम बन जाती है ||
२ )
मानशिक प्रतारणा
मानशिक प्रतारणा एक ऐसा जहर है| जो इंसान को या तो मार देती है या उसे जानवर बना देती है | जब कोइ पुत्र या पुत्री या बहुँ मानशिक प्रतारणा से गुजर रहे होते है या तो वो सहम जाते है या फिर सहमा जाते है || तो संवेदनशील बने ||
३) हम बेटियों को ज्ञान से भर देते है | लेकिन उन्हें फिर से ममता का एहसास नहीं करा पाते | जिसमे ममत्वा हो वो स्त्री एक इंसान से प्रेम नहीं कर सकती | उसके ह्रदय में स्नेह सबके लिए होगा | बच्चो के साथ हमेसा साथ रहे ताकी वक़्त दायरा ना बना पाए |
४)हर व्यक्ति के जीवन में कार्यो का महत्वा है,  पैसे का महत्वा है | लेकिन उस से भी जायदा जरुरी है | एक इंसान होने के नाते एक इंसान को समझना | उसकी मनोस्थिति को समझना | उसे वो प्यार देना जिसका वो हकदार है | समय - समय पर उसकी चुप्पी का कारन पूछना | ||
५ ) अपने निजी जीवन में घट रही घटनाओ को किसी और से ना जोड़े | अक्सर ये देखा जाता है | हम कही का किया कही उतार देते है | माँ - बाप बच्चो पर और बच्चे बड़े हुए तो माँ - बाप पर | क्युकी हमने कही न कही अपने बच्चो को खुद में ढाल दिया है | वो वही करते है जो हमने किया था | लेकिन हमें लगता है हम सही थे वो गलत है |
६) अधिकार ये एक सबसे बड़ी समस्या है आज के समाज की , कर्म का पता नहीं अधिकार का ज्ञान है |
अगर आप आम खाना चाहते है तो पहले आम का पेड़ लगाए किसी और के लगाए हुए पेड़ पे अपना अधिकार ना जताये | वरना रिश्तो की परिभासा बदल जाएगी |
७) याद रहे हमारे बच्चे हमारा कल है | इन्हे सही शिक्षा दे | इनके साथ वक़्त बिताये | इन्हे घर के बुजुर्गों की अहमियत बताएं ,  आप नहीं जाना चाहते विर्धाश्रम तो, आगे आने वाले दिनों में विर्धाश्रम को बंद करवाएं |
८) किसी की भावना आहात ना हो इसका ध्यान रखे | चाहें वो कोइ भी हो आपकी संतान या आपके माँ - बाप |
ये शब्दों की दूरियां , रिश्तो के बदलते नाम और बदलता वक़्त हमसे ही बदलता है | रोज हमसे गुजर कर कोइ गुजर  जाता है और हम कहते है ज़माना बदल गया है ||
ज़माना नहीं बदला दोस्त हम बदल गए है |
हम काठ के हो गए है , हरे पेड़ हमारे अंदर के सुख गए है | हमें उन्हें जिन्दा करना है ||
तो जाईये और पूछिए अपने माँ - पापा से और अपने बच्चो से की आज उन्होंने क्या किया दिन भर | उन्हें सिखाईये दिल से जुड़ना | नहीं तो hdfc  के लोन भरते रह जायँगे | घर फिर भी नहीं बनेगा | मकान एक दिन ढह जायेगा इन शतरंज की बिशात में और राजा कोइ नहीं बनेगा | सब प्यादे ही मर जायेंगे | और जमीं खाली हो जाएगी|  जब भावनाये मर गयी तू रहेगा ना तेरा वज़ूद|  बस मिट्टी बंजर सी रह जाएगी ||

प्रिया मिश्रा :)


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