दुर्योधन के पक्ष लेने वाले
बालक
सुन लो एक कहानी
एक अभिमानी
नहीं कहलाता कभी दानी
कर्ण को उसने छला था
अपनी महत्वकांछा की भूख में
खा गया वो साम्राज्य
९९ भाई की बलि चढ़ाई
माँ के आसूँ भी सुख गए
कुल वधु की लाज
बिकी थी भरे बाजार
दुर्योधन, ना नारी का था
ना खुद वो नर था
वो तो सत्ता का लालची
नरभक्षी था ||
ठुकराया उसने शांति दूत को

युद्ध को ललकारा था
क्या निति कहती है
हजारो की बलि चढ़ा के
कोइ सिंघासन बनाने को

चढ़ जाना पड़ता है
खुद बलि एक राजा बन जाने को ||

अभिलाषा कोइ पाप नहीं
लेकिन जो अभिलाषा खा जाये
पूरा समाज
वो अभिलाषा पाप है
तो मन में मत लावो मेल
पापी को हम पापी ही कहेंगे
तुम दोस्ती रखो या बैर

प्रिया मिश्रा :)

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