मैं तेरी गंगा की धरा
तुम काशी  से मुझमे बस्ते हो

मैं धीरे - धीरे बहती हूँ
तुम महादेव के त्रिशूल पे रहते  हो ||

मैं प्रीत हूँ
तुम प्रेम हो
फिर भी ना मुझसे कुछ कहते हो ||

मैं धीरे - धीरे बहती हूँ
तुम महादेव के त्रिशूल पे रहते  हो ||

मैं जानू तेरी हर बातें
तुम घाट - घाट के सताए हो ||

मैं धीरे - धीरे बहती हूँ
तुम महादेव के त्रिशूल पे रहते  हो ||

तुम दर्द लिए पृथ्वी की
अलग से जग में रहते हो

तुम पत्थर दीखते
जग को लेकिन
तुम पानी से भी बहते हो

तुम प्राण हो
तुम प्रिय हो
तुम प्रिया - प्रिया भी कहते हो ||

मैं धीरे - धीरे बहती हूँ
तुम महादेव के त्रिशूल पे रहते  हो ||

तुम बाँट लो खुद को दुनिया में
हिर्दय को बाटने  से डरते हो

तुम प्रकाश हो
तुम दीपक हो
पर जाने क्यों अँधेरे में तुम रहते हो ||

मैं धीरे - धीरे बहती हूँ
तुम महादेव की त्रिशूल पे रहते  हो ||

तुम जाओ - जाओ कहते हो
लेकिन जाने से मेरे डरते हो
तुम नकार लो खुद को मुझसे
तुम मेरे प्रिय
प्रिया - प्रिया
तुम भी कहते हो ||

मैं धीरे - धीरे बहती हूँ
तुम महादेव की त्रिशूल पे रहते हो ||

मैं ज्ञानी हूँ
मैं अज्ञानी हूँ
मैं तो बहता पानी हूँ
तुम क्यों नहीं ठहर जाते
तुम क्यों यमुना संग बहते हो
 मैं तुम्हारी गंगा हूँ
फिर तुम क्यों प्रयागराज से फिरते हो
अनजान हो
या जान के मुझसे
नाता का कोइ लोभ नहीं
या फिर मैं यूँ कहूं 
तुम्हे बिछोह का कोइ मोह नहीं
कशी हो तुम
फिर क्यों जंगल - जंगल फिरते हो ||

मैं धीरे - धीरे बहती हूँ
तुम महादेव के त्रिशूल  पे रहते   हो ||

तुम मुझे जानते हुए भी
मुझमे एक रहसय ढूंढ़ते हो
हर कण - कण से मेरे पूछते
तुम कितनी गहरी हो
क्या तुम ही गंगा हो या गंगा की प्रहरी हो ||

तुम कही सुनहरी दिखती
कही तुम सवाली सी हो
ये दिन में तुम क्यों हिलोरे लेती
क्यों रात में ठहरी हो
मैं झुक आता हूँ जब किनारे
तुम क्यों खुद को समेट लेती
मैं तुम्हारा काशी  हूँ
फिर क्यों तुम पानी खुद को कहती हो
तुम गंगा हो मेरी
फिर क्यों मन   में  एक शंका है
तुम यमुना हो
या गंगा हो
मैं प्रयागराज
सा फिरता हूँ
लेकिन सच कहूं गंगा
मैं तेरे हिर्दय  में बस्ता हूँ
जीवन मेरा  शिव का त्रिशूल है
लेकिन प्रेरणा तुमसे ही मिलती है
मैं रहूं कही भी
लेकिन प्रिया - प्रिया ही कहता हूँ ||

मेरे मन की व्यथा यहीँ  है
मैं करीब हूँ तुम्हारे
लेकिन तुम्हारे सॉंसों  से मैं
बहता हूँ ,
मैं खुद को छुपाता तुमसे
इसलिए मैं शिव के त्रिशूल पे रहता हूँ ||

पीड़ा मेरी बस इतनी है
गंगा मेरी है
लेकिन मैं खुद ही इसे अस्वीकार कर जाता हूँ
हिर्दय  मेरा तब बेध जाता खुद को
जब मैं ,
प्रिया - प्रिया  कहता  हूँ ||

मैं जानू तेरी पीड़ पिया
इसलिए तो मैं शीतल ही रहती हूँ ||

तुझमे जो आग है
वो प्रेम का हमारा नाता है
वो शिव है
वो शिवा है
वो एक आत्मा सा रहता है
तुम चुप रह कर भी मुझसे बातें करते रहते  हो ||


मैं धीरे - धीरे  बहती हूँ
तुम महादेव के त्रिशूल पे रहते हो ||

प्रिया मिश्रा :)

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