लोग समझते है कहानी लिखना आसान है , लेखक को पता है कहानी लिखने को जीना पड़ता है उस शख्स को जो कहानी का सूत्रधार है || चाहे वो पागल हो , खुशनुमा हो या दुखी हो , मरना पड़ता है कई बार चाहे लेखक जिन्दा ही क्यों ना हो ||

प्रिया मिश्रा :)

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मन के आँगन में प्रेम का एक पौधा , फलेगा - फूलेगा फिर भर देगा तेरे आँगन को अनगिनत फूलो से |
अनगिनत फलो से | तो सींचो इसे प्रेम से | इसपे कोइ जोर ना डालो इसे फलने दो | जरा वक़्त दो | इसकी पत्तियों को भी रंग से सराबोर होने दो | यूँ घेर के ना रखो थोड़ा इसे सूरज की रौशनी से नहाने दो | थोड़ा चाँद को भी प्यार दिखाने दो || तब आयेग एक रंग प्यार का  | सबकी रौशनी लेके खिलेगा आपका पौधा सतरंगी इंद्रधनुष सा
आपके मन के आँगन का प्रेम का पौधा ||

प्रिया मिश्रा :)
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हम जिनके लिए रोते हैं उनके लिए हसना सिख ले तो कैसा हो | सारे पल उसने हमें रुलाया ना होगा | कभी तो हसाया होगा | उन पालो को याद कर ले तो कैसा हो || जिंदगी को जीना  सिख ले तो कैसा हो | प्यार को जी के प्यार देना सिख ले तो कैसा हो |
हम जिनके लिए रोते है उनके लिए हसना सिख ले तो  कैसा हो ||

प्रिया मिश्रा :)
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एक कवी को उपहार में यदि उसी की पंक्तियों को सजा के दिया जाये तो कैसा हो ||
एक कवी को उसके लेखनी के लिए कुछ उत्साह दिया जाये तो कैसा हो ||
सम्मान तो सब देते है
जरा सा प्यार भी दिया जाये तो कैसा हो ||
उपहार में उसे लेखनी और एक स्लेट दिया जाये तो कैसा हो ||
तो परोस दो
आज शब्दों की डलियाँ
की कवी भूखा है
शब्दों का
अभी उसकी एक कहानी बाकि है
एक कविता ने जन्म नहीं लिया
और वो ताक  रहा है की कब सबेरा होगा
सुबह पहली पौ फटने पर वो लिख देगा
एक कविता ,
तो देदो शब्द कवी को उपहार में
वो याचक है शब्दों का
खजाने उसके किसी काम के नहीं
वो राजाओ के झोली में भरे जाते है
कवी तो शब्द खाते है
शब्द सोते है
और शब्द ही लिखते है ||
प्रिया मिश्रा :)
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 वो बिना सुने ही मेरी सारी बातों में हामी भर दिया करता था
मैं जानती थी फिर भी सब कुछ कह दिया करती थी ||
प्रिया मिश्रा :)
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जब तक आसमान सुनहरा हो
एक गुलाबी रंग लिए हुए
और कुछ घाँस अभी बाकि को
पैरो के किनारे - किनारे
अब भी कोइ नदी बहती हो
चिड़ियों का चहचहाना अभी कही दूर ही सही कानो में आती हो
तो समझ लो,
अभी प्रकृति
टूटी हुई है
रूठी हुई नहीं है ||

लेकिन जब बादल काले हो
हवाओ का बोलबाला हो
बाढ़ आये
और बाँध को बहा ले जाये
तिनका - तिनका आसियाने का
जब उड़ते - उड़ाते
एक खंडहर सा बन जाये
एक बसा - बसाया सहर
अब भयावह सा दिखने लगे तो समझ लो
अब प्रकृति रूठी हुई है
लेकिन माँ है
कब तक रूठेगी
फिर से अपन आँचल फैला ही देगी स्नेह का
लेकिन हम क्यों ना आगे बढ़ कर मना ले
अपनी माँ को
क्यों ना उसके आँचल में दे दे
एक और पौधा
एक और शिशु
और एक और बार बना दे उसे जननी |||

प्रिया मिश्रा :)
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 जब तक चलती है परीक्षा
प्रेम की कश्ती तुफानो में रहती है

जब सुरु होता है प्रेम दान
तब वो बटती रहती है ||

इस कश्ती का
एक ही सहारा है
पूर्ण समर्पण
एक ही किनारा है
पूर्ण बिश्वाश

प्रिया मिश्रा :)

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जब प्रेम की कश्ती तुफानो में होती है
तब इसे  किनारे मिलते नहीं
ये ढूंढ लेती है किनारा
और बना लेती है पतवार ||

प्रिया मिश्रा :)
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जब तुमने मुझे नन्हे शिशु की तरह प्यार किया था
तो आज इतना बड़ा कैसे कर दिया
आज भी तो जरुरत है मुझे तेरी
और तू , मुँह फेर लेता है
मैं बड़ी तो हो गयी हूँ
पर आज भी ढूंढ़ती हु
वो तेरा प्यार
जिसे तुम मन में छुपाये बैठे हो
इस से पहले की
वो घाँस सुख जाये जो तेरी प्रेम की बारिश पे पनपी थी
एक बार फिर ,
आ जाना सावन बन के
क्या पता फिर से शिशु की आत्मा तुम्हे पुकारती हो
और फिर ना पुकारे ||

प्रिया मिश्रा :)


 

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