प्रेम सच्चे प्रेम को जानता है
जो आकर्षण पे आकर्षित होता है
वो आकर्षण ही होता है
प्रेम नहीं
प्रेम कभी अकेला नहीं होता वो जुड़ा रहता है
आत्मा के परमात्मा से ||

प्रिया मिश्रा :)
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मैं बहोत दूर तक चलती रही तुम्हारे साथ
मेरे पाँव में काटें चुभ आये थे
मेरे आँखों का पानी सुख गया था
तुम इंकार करते रहे
मैं बस तुम्हारी आँखों की
बातें पढ़ना चाहती थी
बहोत दूर तक तुम्हारे साथ चल के
 तुम्हे महसूस करना चाहती थी
लेकिन जब तुमने मुड़  के नहीं देखा
और आखरी बार मेरा हाथ झटक दिया
तब मुझे एहसास हुआ
तुम्हारा प्रेम
प्रेम था ही नहीं
एक आकर्षण था
जो , ख़त्म हो गया वक़्त के साथ
अब किस रिश्ते से तुम्हे रोकूँ
और किस रिश्ते से तुम्हारा रास्ता रोकूँ
कोइ राह भी तुमने नहीं छोड़ी
और कोइ प्रीत भी नहीं ||

प्रिया मिश्रा :)
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हाँ, का था में यकीन  कर लेना
जीना मुश्किल है उतना दुखदाई भी ||

प्रिया मिश्रा :)
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यकीं नहीं आता ये वही आदमी है
जिसे आदमी होने पर गुमान हुआ करता था ||

प्रिया मिश्रा
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इंसान पाप पुण्य का घड़ा है
जिस दिन भर जाता है
उस दिन फ़ुट जाता है

प्रिया मिश्रा :)
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 मैं कभी - कभी ठहाके लगाती हूँ
जब रोने को दिल करता है ||

प्रिया मिश्रा :)


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