मुँह के बल गिरे हुए आदमी को ये एहसास हो जाता है
उसने धैर्य को नहीं छोड़ा
धैर्य ने उसे छोड़ दिया है ||
प्रिया मिश्रा :)
*****************************************************************************
इंसान घमंड नहीं करता
इंसान तो वक़्त की चक्की में पिस्ता हुआ वो अनाज है
जो कभी पिस्ता है
कभी उभरता है
प्रिया मिश्रा :)
**********************************************************************************
मेरे उत्तर की प्रतीक्षा मत करना
मैं फिर जन्म लुंगी ,
एक प्रश्न बनके
प्रिया मिश्रा :)
*****************************************************************************
आज जब मृत्यु ने मेरे द्वार को खटखटाया
मेरे अंदर का आदमी बाहर आया
वो देखने लगा आकाश
उसे नहीं हो रहा था बिश्वाश ||
अभी कहाँ मेरे मन का दीपक जला है
अभी तक तो मैंने सबको छला है
रहने दो और कुछ दिन
देदो मुझे और अवकास
मैं गिड़गिड़ाने लगा
मृत्यु हसने लगी
कहने लगी तेरी आज की ही तारीख तय थी
तूने सोचा, तूने विजय पा लिया मुझपे
तू होगा महलो का राजा
मैं तो सबपे भारी हु
मैं ना किसी का आभारी हूँ
तब जब समय था
तो तू ,छला करता था लोगो को
आज समय ने तुझे छल लिया ||
यही जगत की रीत है
मौत की किस से ना प्रीत है ||
प्रिया मिश्रा :)
*************************************************************************************
ये दो पंक्तियों की कहानी हमसे ना लिखी जाएगी
मैं तो मन की बात कहूँगी
जी भर जीने का राह बना के आगे को बढ़ते रहूंगी
मृत्यु आनी है तो आएगी ||
प्रिया मिश्रा :)
*************************************************************************************
पहले पूरा गुलिस्ताँ खड़ा था
गुल को सुलगाने में
अब गुल अलविदा कह रहा
और गुलिस्तां एक गुल को निचोड़ के
दूसरे गुल को माले पहना रहा है
है ना
अनोखी कहानी
गुल की ,
और गुलिश्तां की ||
प्रिया मिश्रा :)
***************************************************************************************
क्यों नहीं कोइ कह देता की वो आज उदास है
क्यों सन्नाटा पी के मुस्कुराता रहता है
आदत हो गयी है
मुखौटा लगाने की
या जोकर हो जो रोते हुए भी मुस्कुराना जरुरी है ||
प्रिया मिश्रा :)
*********************************************************************************
ये अजीब सी दुनिया में
अजीब सा रिवाज बस्ता है
यहाँ लोग गले मिल के
हलक से जुबान निकाल लेते है
फिर उनको तोड़ के मड़ोड़ के
दावत में पेश करते है
जैसे, खुद की पकाई कोइ लाजवाब सी कोरमा हो
और खाने वाला ऐसे खाता है , जैसे
खून और गोश का भूखा कोइ भेड़ियाँ हो ||
प्रिया मिश्रा :)
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ये इश्क में पड़ के जिनके अश्क़ो ने रश्क किये है
उनके घुंगरू पैरों से टूट गए ,
खून से लथपत पैरों ने निशाँ छोड़े हैं
ढूंढ सको तो ढूंढ लेना निशानी
अगर दिखे कोइ कहानी
तो तुम ही बता देना
क्या सत्य है
क्या असत्य है
प्रिया मिश्रा :)
*************************************************************************************
मैं जब ट्रैन से सफर कर रही थी
आधी नींद में मुझे एक सपना आया
की एक बच्चा पटरियों के बिच दौडता हुआ सफर कर रहा था
वो बच्चा सा दिखने वाला
माशूम सा ,
वक़्त की धुप में पका हुआ
एक अधबूढ़े की आत्मा
पानियों का गिलास लेके
एक रुपये में जिंदगी बेच रहा थी
और अपनी जिंदगी बचा रही थी ||
प्रिया मिश्रा :)
उसने धैर्य को नहीं छोड़ा
धैर्य ने उसे छोड़ दिया है ||
प्रिया मिश्रा :)
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इंसान घमंड नहीं करता
इंसान तो वक़्त की चक्की में पिस्ता हुआ वो अनाज है
जो कभी पिस्ता है
कभी उभरता है
प्रिया मिश्रा :)
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मेरे उत्तर की प्रतीक्षा मत करना
मैं फिर जन्म लुंगी ,
एक प्रश्न बनके
प्रिया मिश्रा :)
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आज जब मृत्यु ने मेरे द्वार को खटखटाया
मेरे अंदर का आदमी बाहर आया
वो देखने लगा आकाश
उसे नहीं हो रहा था बिश्वाश ||
अभी कहाँ मेरे मन का दीपक जला है
अभी तक तो मैंने सबको छला है
रहने दो और कुछ दिन
देदो मुझे और अवकास
मैं गिड़गिड़ाने लगा
मृत्यु हसने लगी
कहने लगी तेरी आज की ही तारीख तय थी
तूने सोचा, तूने विजय पा लिया मुझपे
तू होगा महलो का राजा
मैं तो सबपे भारी हु
मैं ना किसी का आभारी हूँ
तब जब समय था
तो तू ,छला करता था लोगो को
आज समय ने तुझे छल लिया ||
यही जगत की रीत है
मौत की किस से ना प्रीत है ||
प्रिया मिश्रा :)
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ये दो पंक्तियों की कहानी हमसे ना लिखी जाएगी
मैं तो मन की बात कहूँगी
जी भर जीने का राह बना के आगे को बढ़ते रहूंगी
मृत्यु आनी है तो आएगी ||
प्रिया मिश्रा :)
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पहले पूरा गुलिस्ताँ खड़ा था
गुल को सुलगाने में
अब गुल अलविदा कह रहा
और गुलिस्तां एक गुल को निचोड़ के
दूसरे गुल को माले पहना रहा है
है ना
अनोखी कहानी
गुल की ,
और गुलिश्तां की ||
प्रिया मिश्रा :)
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क्यों नहीं कोइ कह देता की वो आज उदास है
क्यों सन्नाटा पी के मुस्कुराता रहता है
आदत हो गयी है
मुखौटा लगाने की
या जोकर हो जो रोते हुए भी मुस्कुराना जरुरी है ||
प्रिया मिश्रा :)
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ये अजीब सी दुनिया में
अजीब सा रिवाज बस्ता है
यहाँ लोग गले मिल के
हलक से जुबान निकाल लेते है
फिर उनको तोड़ के मड़ोड़ के
दावत में पेश करते है
जैसे, खुद की पकाई कोइ लाजवाब सी कोरमा हो
और खाने वाला ऐसे खाता है , जैसे
खून और गोश का भूखा कोइ भेड़ियाँ हो ||
प्रिया मिश्रा :)
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ये इश्क में पड़ के जिनके अश्क़ो ने रश्क किये है
उनके घुंगरू पैरों से टूट गए ,
खून से लथपत पैरों ने निशाँ छोड़े हैं
ढूंढ सको तो ढूंढ लेना निशानी
अगर दिखे कोइ कहानी
तो तुम ही बता देना
क्या सत्य है
क्या असत्य है
प्रिया मिश्रा :)
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मैं जब ट्रैन से सफर कर रही थी
आधी नींद में मुझे एक सपना आया
की एक बच्चा पटरियों के बिच दौडता हुआ सफर कर रहा था
वो बच्चा सा दिखने वाला
माशूम सा ,
वक़्त की धुप में पका हुआ
एक अधबूढ़े की आत्मा
पानियों का गिलास लेके
एक रुपये में जिंदगी बेच रहा थी
और अपनी जिंदगी बचा रही थी ||
प्रिया मिश्रा :)
Aati sundar sabado ka chayan kiya hai aapne... Priya Mishra...
ReplyDeleteSuchitra Pandey
thanku suchi ji :)
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