एक फूल मुरझाया हुआ सा किसी कोने में पड़ा था
हमने उसके बाग़ लगा दिया
अब अनेक फूल है
मुस्कुराते हुए से ||
प्रिया मिश्रा :)
**************************
******************************
मेरी मुस्कराहट मासूम है
इसे खिलने दो
आज पर्यावरण दिवस है ||
प्रिया मिश्रा :)
*************************
******************************
ये इश्क की बात में
कुल्हाड़ी सी धार है
कुछ न कुछ घाव आ ही जाता है
स्वीकार करो तो भी
ना करो तो भी ||
प्रिया मिश्रा :)
***************************
ये संघर्ष की बात करते - करते
हमने रास्ते को खाई बना दिया
अब सोचते है
संघर्ष पहले था,
या अब है
प्रिया मिश्रा :)
********************************
रात भर तारो को निहारते हुए
सोचती रही मैं ,
इन तारो का क्या काम ,
फिर ख्याल आया ,
प्रकृति के आँचल में जुगनू ना हो
तो रात काली सी हो जाएगी
चाँद अकेला क्या करेगा
जब प्रकीर्ति की साड़ी स्याही हो जाएगी ||
प्रिया मिश्रा :)
*************************
*******************************
ऐसा क्या है तुममे जो खुदा बने फिरते हो
एक मुस्कराहट भी नहीं तेरी झोली में
तुझसे मिलकर लोग
फुट - फुट के रोते है
तो किस बात का ग़ुरूर किया करते हो ||
प्रिया मिश्रा :)
********************
पेड़ो की टहनियाँ
और बाप के कंधे
झुक जाने के बाद काट दिए जाते है
प्रिया मिश्रा :)
*********************************
एक तस्वीर पे असंख्य बाते
असंख्य रहे विचार
मन द्रवित हो जात है
माया है संसार
प्रिया मिश्रा :)
***************************
मैं एक पुराना बीज़ हूँ
अभी अंकुरित नहीं हुआ
अभी मैं सिख रहा हूँ
मानव प्रविर्ती को
किसी के कदमो की आहट आई है
लगता है शिक्षा अधूरी रह जाएगी
ये थाप पैरो के
जाने फूकेंगे प्राण
ये ले लेंगे मुझसे मेरा जीवन
अभी ज्ञान अधूरा है
सिख रहा हूँ
प्रिया मिश्रा :)
*****************************
गहरे अन्धकार को चीर के निकलना
सीखा है हमने
इन नन्हे बीजो से
जो अभी - अभी मुस्कुराये है
अपने नन्हे - नन्हे कोपल से
प्रिया मिश्रा :)
**************************************
***********************************
स्त्री के हिर्दय में प्रेम ही प्रेम है
बस कोइ भावना नहीं
अधिकार ही नहीं है
प्रिया मिश्रा :)
*****************************
*********************************
पत्थर के फूल नहीं खिला करते
लेकिन , पत्थर में फूल खिलते है
जरा वक़्त दो
कुल्हाड़ी से वार करो
कोइ दरार आने दो
झरनो को फूटने दो
तब खिलेगा फूल
मिश्रित दर्द का
अभी इन्तजार करो
अभी पत्थर है
पिघला नहीं है ||
प्रिया मिश्रा :)
********************************
********************************
मैं तो ये सोच कर सोता रहा
अबके आवोगे तो
मैं अन्नत नींद में खो जाऊंगा
ये रोज का आना - जाना
सस्वीकार नहीं
प्रिया मिश्रा :)
हमने उसके बाग़ लगा दिया
अब अनेक फूल है
मुस्कुराते हुए से ||
प्रिया मिश्रा :)
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मेरी मुस्कराहट मासूम है
इसे खिलने दो
आज पर्यावरण दिवस है ||
प्रिया मिश्रा :)
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ये इश्क की बात में
कुल्हाड़ी सी धार है
कुछ न कुछ घाव आ ही जाता है
स्वीकार करो तो भी
ना करो तो भी ||
प्रिया मिश्रा :)
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ये संघर्ष की बात करते - करते
हमने रास्ते को खाई बना दिया
अब सोचते है
संघर्ष पहले था,
या अब है
प्रिया मिश्रा :)
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रात भर तारो को निहारते हुए
सोचती रही मैं ,
इन तारो का क्या काम ,
फिर ख्याल आया ,
प्रकृति के आँचल में जुगनू ना हो
तो रात काली सी हो जाएगी
चाँद अकेला क्या करेगा
जब प्रकीर्ति की साड़ी स्याही हो जाएगी ||
प्रिया मिश्रा :)
*************************
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ऐसा क्या है तुममे जो खुदा बने फिरते हो
एक मुस्कराहट भी नहीं तेरी झोली में
तुझसे मिलकर लोग
फुट - फुट के रोते है
तो किस बात का ग़ुरूर किया करते हो ||
प्रिया मिश्रा :)
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पेड़ो की टहनियाँ
और बाप के कंधे
झुक जाने के बाद काट दिए जाते है
प्रिया मिश्रा :)
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एक तस्वीर पे असंख्य बाते
असंख्य रहे विचार
मन द्रवित हो जात है
माया है संसार
प्रिया मिश्रा :)
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मैं एक पुराना बीज़ हूँ
अभी अंकुरित नहीं हुआ
अभी मैं सिख रहा हूँ
मानव प्रविर्ती को
किसी के कदमो की आहट आई है
लगता है शिक्षा अधूरी रह जाएगी
ये थाप पैरो के
जाने फूकेंगे प्राण
ये ले लेंगे मुझसे मेरा जीवन
अभी ज्ञान अधूरा है
सिख रहा हूँ
प्रिया मिश्रा :)
*****************************
गहरे अन्धकार को चीर के निकलना
सीखा है हमने
इन नन्हे बीजो से
जो अभी - अभी मुस्कुराये है
अपने नन्हे - नन्हे कोपल से
प्रिया मिश्रा :)
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स्त्री के हिर्दय में प्रेम ही प्रेम है
बस कोइ भावना नहीं
अधिकार ही नहीं है
प्रिया मिश्रा :)
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पत्थर के फूल नहीं खिला करते
लेकिन , पत्थर में फूल खिलते है
जरा वक़्त दो
कुल्हाड़ी से वार करो
कोइ दरार आने दो
झरनो को फूटने दो
तब खिलेगा फूल
मिश्रित दर्द का
अभी इन्तजार करो
अभी पत्थर है
पिघला नहीं है ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैं तो ये सोच कर सोता रहा
अबके आवोगे तो
मैं अन्नत नींद में खो जाऊंगा
ये रोज का आना - जाना
सस्वीकार नहीं
प्रिया मिश्रा :)
Wow every poem is too good
ReplyDeletethank you :)
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