ये शिकायतों का सिलसिला चलता रहेगा
अगर निकल ना पावोगे अपने पूर्वजन्म से
नया जन्म लो और भविष्य देखो
इसकी गर्भ में बहोत कुछ है जानने को
तुम्हारा अपना भी
और पराया भी ||
प्रिया मिश्रा :)
************************************
जंगल में खोना सबको आता है
जंगल से निकल आवो तो बताना
राह कठिन थी
या नई राह मिल गयी
निकल आये ,या
फिर से भटक गए
नए पेड़ो की तरह झूमना सीखा
या ठूठ हो गए वही
कटे पेड़ो की तरह
जंगल से निकल आना तो बताना
प्रिया मिश्रा :)
**************************
हम रिवाजो में इतने ग़ुम गए है
की नया कुछ करना ही नहीं आता
पलटते रहते है वही
भूली - बिसरि यादें
आज में जीना ही नहीं आता
जब खुद को नहीं सीखा पाए नए रिवाजो को बनाना
तो कैसे कह दे की
नए रिवाज तुम बना लो
बुरा को बुरा कहने दो
तुम खुद को अच्छा बना लो
कम से कम आईना एक चेहरा तो देखे
सचाई का ,
तो रहने तो बुराई
खुद को अच्छाई बना लो
प्रिया मिश्रा :)
*********************************************
अभिमानी मनुस्य खुद को वैसे ही जलाता है
जैसे चूल्हे में पड़ा कोयला
जलते - जलते राख हो जाता है |||
प्रिया मिश्रा :)
***********************************
अभी जो आग लगी है
वो रोटी की है
ज्ञान बाद में देना
भूखा पेट रोटी मांगता है
ज्ञान उसके आग को शांत ना कर पायेगी
स्वर्ग - नर्क
सब भूख ही हैं
एक भूखे के लिए ||
प्रिया मिश्रा :)
************************************
जहाँ ज्ञान काम ना आये
वहां प्रेम काम आता है
जहाँ परिभासा समझ नहीं आती
वहाँ गूँगा रह जाना ही भला
जो अच्छी - भली बाते समझ आये तो लिख दो
जो ना आये तो ,
कोरा कागज अच्छा है
शब्दों के कीचड़ से
प्रिया मिश्रा :)
****************************************
मैं जन्मा था बिष लेके
मेरा कर्म है डसना
लेकिन मैं तो फिर भी
आहात पे फुँकार उठाऊँ
तुम मनुष्य ,
लालच में गिर गए कितना
शर्प भी तुमसे डरता है
कहाँ से लाये बिष इतना
मैं सभ्य न हुआ
कर्म था मेरा डसना
तुम मनुष्य क्यों ना सभ्य हुए
कहाँ से सीखा डसना
प्रिया मिश्रा :)
*********************************************
ये मनुष्य प्रजाति के लोग वहाँ क्यों नहीं पाए जाते
जहाँ मनुष्यता की जरुरत होती है ||
प्रिया मिश्रा :)
******************************************
मैं एक पुरुष द्वारा छली गयी हूँ
मैं एक पुरुष द्वारा शापित हूँ
मैं नारी हूँ
मैं पत्थर हूँ
मैं अहिल्या हूँ
प्रिया मिश्रा :)
*************************************************
प्रताड़ना एक ऐसा जहर है
जो धीरे - धीरे असर करता है
और केस रफा - दफा
प्रिया मिश्रा :)
**************************************
अपमान कोइ नहीं भूलता जानवर भी नहीं
संवेदनशील होना सीखे :)
प्रिया मिश्रा :)
*************************************************
अपनों के बिच अपमान सहने से बड़ा कोइ और श्राप नहीं
प्रिया मिश्रा :)
***********************************************************
धर्म - अधर्म की लड़ाई में धर्म दो कदम पीछे होता है हारता नहीं
वो बस वक़्त पे वार करता है
धर्म योद्धा है
कायर नहीं ||
प्रिया मिश्रा :)
**************************************************
हम रहे ना रहे
समय शास्वत है
और करवट भी लेता है
बोलता भी है
और सुनता भी है
समय वरदान भी है
और श्राप भी
प्रिया मिश्रा :)
*************************************************
बनाने वाले ने जुबान को इतना तीखा बनाया है
की आज कल हथियारों की जरुरत नहीं पड़ती
लोग शब्दों से मार देते है
और मारा हुआ आदमी सड़ता रहता है
एक लाश बनकर ||
प्रिया मिश्रा :)
************************************************
जितनी जायदा पीड़ा होती है
खून उतना गर्म होता है
जितना जायदा खून गर्म होता है
उतना ही रिश्ता है
और फिर वो घाव नासूर बन जाता है
जिसका कोइ इलाज नहीं ||
प्रिया मिश्रा :)
**************************************
मानव सम्बन्धो में अब सम्बन्ध नहीं बस्ते
एक दुर्गन्ध बस्ती है
प्रिया मिश्रा :)
***********************************
मैं घाँस नहीं बनूँगी
जिसे पैरों तले रौंदा जाये
वृक्ष बनना मेरी नियति है
प्रिया मिश्रा :)
******************************************
अपमान जहर तो है
लेकिन मैं शिव भक्त हूँ
बिष मेरी रगो में अमृत का काम करता है ||
प्रिया मिश्रा :)
*************************************************
जलती हुई ज्वाला को आंच ना दिखाए
पता नहीं किसकी नियति पलट जाये
अभी संसार बाकि है
और आग भी
प्रिया मिश्रा :)
*****************************************
मुझे आग की जरुरत है
मैं अभी कच्चा हूँ
जितना पकूंगा
स्वादिस्ट लगूंगा
मेरा कोइ नुक्सान नहीं
लेकिन ध्यान रहे
कही चिंगारी तुम्हे ना छू जाये
तुम सह ना पावोगे
क्युकी ,
तुम्हे आग उगलने की आदत है
सँभालने की नहीं ||
प्रिया मिश्रा :)
************************************
जहर का खाया जहर ही उगलता है
नीम कभी आम नहीं फलता है
बीज, नीम का हो या आम का
फल अवस्य देता है
लेकिन हमें नीम लगाने की आदत है
खाने की नहीं ,
वो तो जब खाते है
तब याद आता है
कोइ अपराध हुआ है
कोइ बीज गलत लग गया
और फल जीवन भर यही खाना है ||
प्रिया मिश्रा :)
अगर निकल ना पावोगे अपने पूर्वजन्म से
नया जन्म लो और भविष्य देखो
इसकी गर्भ में बहोत कुछ है जानने को
तुम्हारा अपना भी
और पराया भी ||
प्रिया मिश्रा :)
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जंगल में खोना सबको आता है
जंगल से निकल आवो तो बताना
राह कठिन थी
या नई राह मिल गयी
निकल आये ,या
फिर से भटक गए
नए पेड़ो की तरह झूमना सीखा
या ठूठ हो गए वही
कटे पेड़ो की तरह
जंगल से निकल आना तो बताना
प्रिया मिश्रा :)
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हम रिवाजो में इतने ग़ुम गए है
की नया कुछ करना ही नहीं आता
पलटते रहते है वही
भूली - बिसरि यादें
आज में जीना ही नहीं आता
जब खुद को नहीं सीखा पाए नए रिवाजो को बनाना
तो कैसे कह दे की
नए रिवाज तुम बना लो
बुरा को बुरा कहने दो
तुम खुद को अच्छा बना लो
कम से कम आईना एक चेहरा तो देखे
सचाई का ,
तो रहने तो बुराई
खुद को अच्छाई बना लो
प्रिया मिश्रा :)
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अभिमानी मनुस्य खुद को वैसे ही जलाता है
जैसे चूल्हे में पड़ा कोयला
जलते - जलते राख हो जाता है |||
प्रिया मिश्रा :)
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अभी जो आग लगी है
वो रोटी की है
ज्ञान बाद में देना
भूखा पेट रोटी मांगता है
ज्ञान उसके आग को शांत ना कर पायेगी
स्वर्ग - नर्क
सब भूख ही हैं
एक भूखे के लिए ||
प्रिया मिश्रा :)
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जहाँ ज्ञान काम ना आये
वहां प्रेम काम आता है
जहाँ परिभासा समझ नहीं आती
वहाँ गूँगा रह जाना ही भला
जो अच्छी - भली बाते समझ आये तो लिख दो
जो ना आये तो ,
कोरा कागज अच्छा है
शब्दों के कीचड़ से
प्रिया मिश्रा :)
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मैं जन्मा था बिष लेके
मेरा कर्म है डसना
लेकिन मैं तो फिर भी
आहात पे फुँकार उठाऊँ
तुम मनुष्य ,
लालच में गिर गए कितना
शर्प भी तुमसे डरता है
कहाँ से लाये बिष इतना
मैं सभ्य न हुआ
कर्म था मेरा डसना
तुम मनुष्य क्यों ना सभ्य हुए
कहाँ से सीखा डसना
प्रिया मिश्रा :)
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ये मनुष्य प्रजाति के लोग वहाँ क्यों नहीं पाए जाते
जहाँ मनुष्यता की जरुरत होती है ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैं एक पुरुष द्वारा छली गयी हूँ
मैं एक पुरुष द्वारा शापित हूँ
मैं नारी हूँ
मैं पत्थर हूँ
मैं अहिल्या हूँ
प्रिया मिश्रा :)
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प्रताड़ना एक ऐसा जहर है
जो धीरे - धीरे असर करता है
और केस रफा - दफा
प्रिया मिश्रा :)
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अपमान कोइ नहीं भूलता जानवर भी नहीं
संवेदनशील होना सीखे :)
प्रिया मिश्रा :)
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अपनों के बिच अपमान सहने से बड़ा कोइ और श्राप नहीं
प्रिया मिश्रा :)
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धर्म - अधर्म की लड़ाई में धर्म दो कदम पीछे होता है हारता नहीं
वो बस वक़्त पे वार करता है
धर्म योद्धा है
कायर नहीं ||
प्रिया मिश्रा :)
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हम रहे ना रहे
समय शास्वत है
और करवट भी लेता है
बोलता भी है
और सुनता भी है
समय वरदान भी है
और श्राप भी
प्रिया मिश्रा :)
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बनाने वाले ने जुबान को इतना तीखा बनाया है
की आज कल हथियारों की जरुरत नहीं पड़ती
लोग शब्दों से मार देते है
और मारा हुआ आदमी सड़ता रहता है
एक लाश बनकर ||
प्रिया मिश्रा :)
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जितनी जायदा पीड़ा होती है
खून उतना गर्म होता है
जितना जायदा खून गर्म होता है
उतना ही रिश्ता है
और फिर वो घाव नासूर बन जाता है
जिसका कोइ इलाज नहीं ||
प्रिया मिश्रा :)
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मानव सम्बन्धो में अब सम्बन्ध नहीं बस्ते
एक दुर्गन्ध बस्ती है
प्रिया मिश्रा :)
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मैं घाँस नहीं बनूँगी
जिसे पैरों तले रौंदा जाये
वृक्ष बनना मेरी नियति है
प्रिया मिश्रा :)
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अपमान जहर तो है
लेकिन मैं शिव भक्त हूँ
बिष मेरी रगो में अमृत का काम करता है ||
प्रिया मिश्रा :)
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जलती हुई ज्वाला को आंच ना दिखाए
पता नहीं किसकी नियति पलट जाये
अभी संसार बाकि है
और आग भी
प्रिया मिश्रा :)
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मुझे आग की जरुरत है
मैं अभी कच्चा हूँ
जितना पकूंगा
स्वादिस्ट लगूंगा
मेरा कोइ नुक्सान नहीं
लेकिन ध्यान रहे
कही चिंगारी तुम्हे ना छू जाये
तुम सह ना पावोगे
क्युकी ,
तुम्हे आग उगलने की आदत है
सँभालने की नहीं ||
प्रिया मिश्रा :)
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जहर का खाया जहर ही उगलता है
नीम कभी आम नहीं फलता है
बीज, नीम का हो या आम का
फल अवस्य देता है
लेकिन हमें नीम लगाने की आदत है
खाने की नहीं ,
वो तो जब खाते है
तब याद आता है
कोइ अपराध हुआ है
कोइ बीज गलत लग गया
और फल जीवन भर यही खाना है ||
प्रिया मिश्रा :)
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