प्राथना एक आखरी पत्र

मेरी इतनी सी प्राथना है
मैं जीवन को अनुभव कर पाऊँ
मेरी इतनी सी प्राथना है
मेरे  पावँ रहे जमीं पर
और आकाश को हाथो से समेट लूँ
मैं चिड़ियाँ बन के उड़ जाऊँ
बादलों  से अपना श्रृंगार करूँ
मैं प्रकृति के रंग में रंग जाऊँ
अब ना मैं पिंजरे का जीवन स्वीकार करूँ ||
एक पैर  में पायल लो
एक पैर में फूलो का श्रृंगार हो
माथे पे मेरे सूरज चमके
चांदनी को दुपट्टे में टाँक
मैं चाँद की दुल्हन बन जाऊँ ||
मैं गिरधर की मुरली बन जाऊँ
मैं राधा की सहेली बन जाऊँ
मैं नृत्य करूँ
बाँध बूंदो को पग में
मैं मोरनी के पंख चुरा लाऊँ
मैं बनु किसी की सहेली
मैं भी  प्रियतम संग करू अठखेली
 मैं आंख मिचौली खेलूँ
मैं बच्चे का प्राण बन जाऊँ ||

मैं हसूँ 
खिलखिला के
मेरे हसीं से झरना फुट पड़े
मैं पहाड़ो में भी जीवन भर लाऊँ 
मेरी ख़ामोशी को ग्रहण लगे
मेरी आवाज को कोइ शुर मिले
मैं अँधेरे को चिर के बाहर आऊँ 
एक सूरज मेरा भी इन्तजार करे
अब कोइ ना मेरा तिरस्कार करे
किसी में इतना ना साहस हो
वो मुझे मौसम के साथ बदल जाये
जो प्रेम नहीं निभा सकता
वो दूर से भी ना मेरा दीदार करे
 मैं खो जाऊँ उसके जीवन से
जो मुझमे विकल्प ढूंढ़ता है
अब बस वही आये मेरे जीवन में
जो मुझे मेरे जैसा स्वीकार करे
 जिसमे कोइ रिवाजो की कोइ रीत न हो
ऐसा कोइ मनमीत हो
 जिसके जीवन के गीत में
मेरे अधरों की गीत हो

है प्राथना
इतनी सी
जो तुम स्वीकार करो
मेरे जीवन में भी रंग भर दो
हे गिरधर,
अब मुरली की तान को रहने दो
जरा इधर भी ध्यान करो
बन जाओ सखा मेरे भी
की धरती की मिट्टी में वो नमी नहीं
जो मेरे मन को जोड़ सके
तो तुम बन जाओ
जीवन की आस
बन जाओ मेरे बिश्वाश
जला दो मुझमे एक ज्योत नई सी
खिला  दो मुझे भी
एक नई कली सी
मैं सुख का श्रृंगार करना चाहती हूँ
मैं भी मधुबन से प्रेम करना चाहती हूँ
तुम तो अन्नत हो
सब कुछ तुमको दीखता हैं
फिर एक घर में अंधेर क्यों
क्या ये तुम्हारा मुझ संग कोइ अन्याय नहीं 
क्या तुमको मुझसे कोइ प्रेम नहीं
क्या भक्त का रोना जरुरी है
क्या भगवान् का हिर्दय  कोमल नहीं ||

तो फिर मुरली का ध्यान आज रहने दो
काट दो मेरी भी बेड़ियोँ  को
कारागार अब मुझे स्वीकार नहीं
देदो मुझे सुनहरे पंख
मैं उड़ना चाहती हूँ
तुम्हारी दुनिया कैसी है
ये सपना  है या कोइ सच हैं
मैं हिर्दय  से जुड़ना चाहती हूँ

तुम प्रीत की रीत निभा दो
हे गिरधर अब तो मुस्कुरा दो
अब छोड़ो ये अपनी जिद्द
आ जाओ , मेरे सपने में
और मेरा सपना सजा दो

कल का सबेरा मेरा हो
ऐसा कोइ चमत्कार करो
सूरज की किरणे मुझे भी देखे
अब बादलों  का ना कोइ पहरा हो
बारिश भी हो
और इंद्रधनुष भी
अब हर दिन पे मेरा अधिकार रहे
फूलो की खुसबू से
खील उठूँ मैं
मेरी हर थिरकन पे
कोइ मोहनी ताल बजे

कोइ राग अब फिर से बजा जाना
हे राधे के श्याम
अबकी सपने में आ जाना
भर देना मेरे जीवन में राग
और कोइ निशानी दे जाना
की तुम आये थे
न हो तो मुरली ही अपनी
मेरी सिरहाने रख जाना
ये सन्देश होगा की
मेरा भी अब उद्धार होगा
जब कृष्णा सपने में
आपका आना स्वीकार होगा ||

प्रिया मिश्रा :)




Comments

Popular posts from this blog