"श्रीमान - श्रीमती ""
मैं आज जरा परेशान सा अपने लौन में घूम रहा था | तभी श्रीमती जी की चीखने की आवाज आई | मैं दौड़ा - दौड़ा गया | देखा श्रीमती जी अपने छोटे से दिमाग वाले सर को मोटे से कपड़े से बांध के बैठी है ||
मैंने कहाँ क्या हुआ ऐसे क्यों चिल्ला रही हैं आप | अभी सिर्फ मैं उठा हूँ सबको उठा के क्यों बताना चाहती है की सुबह का बर्तन मैं धोता हूँ ||
अरे वो बात नहीं है गट्टू के पापा वो हमारे सर में बहुत जोर का मरोड़ उठ रहा |
मैंने कहा सर में मरोड़ ये तुमने आधुनिक बात न कर दी कुछ |
हां हां सच में | लेकिन तुम रहने दो | वो मैं मायके से जो नीली , पिली , लाल गोलिया लेके आई हूँ वो ला दो जरा पानी के साथ |
मैंने कहाँ एक बात बताओ भाग्यवान ये जब भी तुम्हारे सर में दर्द होता है तुम मायके की गोलियां ही क्यों खाती हो | और भी तो दवाईया है ||
अरे नहीं - नहीं , ये मेरी माँ ने गावँ के बैध से बनवाई है ||
कौन वो हरी राम हलवाई का बेटा |
हां हां वही ||
वो तो कई वर्षो तक अपने पिता के साथ जलेबियाँ बनाता था | उसने कब बैध की पढ़ाई पढ़ ली ||
अरे वो पढता भी था और अपने पिता की मदद भी करता था |
मैं समझ गया था ये श्रीमती जी की चाल है मेरी संडे खराब करने की ||
मैंने जान बूझकर ,
जोर - जोर से बोलना सुरु कर दिया
अरे भाग्यवान कोइ बात नहीं ,अगर तुम्हारी तबियत खराब है तो मैं खाना बना लूंगा | तुम आराम कर लो |
तभी हमारी पड़ोसन ने सुन लिए बोली अरे शर्मा जी क्या आप भी , बहन जी की तबियत खराब है| तो हम कब काम आएंगे | अब एक ने सुन ली मेरा काम हो गया | मैंने दो कप चाय बनाई और आराम से सोफे पे बैठ के
अखबार के मजे लेने लगा | डोर - बेल बजी | मैं गया, तिवारी जी से अपनी धर्म पत्नी के साथ | दोनों आये अंदर और हाथ में कचौरियाँ हाय , "सुबह की चाय"" सुन्दर पड़ोसन" और 'कचौड़ी"और भी कुछ चाहिए क्या जीने को ||
तिवारी जी पत्नी जितनी सुन्दर है आये - हाय क्या बताये उस से भी अच्छा खाना बनाती है ||
तिवारी जी अपनी पत्नी से बोले तुम कहाँ बना दो शर्मा जी का तब तक मैंने और शर्मा जी बात कर लेते है |
और भाबी जी से भी हाल पूछ लो |
मैंने तो यु ही कह दिया | अरे नहीं - नहीं भाभी जी रहने दे मैं बना लूंगा | अंदर तो छोले - कुलचे चल रहे दे |
सुबह तो आहा क्या बताएं कचौड़ियो की खुसबू दिल में बैठ गयी है ||
अभी दोपहर के बारे में सोच ही रहा था की मिश्रा जी वाइफ आई दाल , चावल पापड़ चटनी |
वैसे ये दाल तो सादी थी ,लेकिन जाने क्यों मेरी श्रीमती जी को अब छौका लग चूका था ||
भन्नाते हुए बोली एजी , ये सब क्या है ??
और इ मिश्राइन इतना तुमको देख के दाँत कहे दिखा रही थी ?
हम का जाने भाग्यवान उनको सायद लगा होगा बीमार है हम "औसधी" दे रही थी शायद |
क्या कहाँ ?
अरे मैं कहाँ कुछ कह रहा हूँ | तुम बीमार थी इसलिए आई थी | तुम्हारा हाल पूछने |
अच्छा और दरवाजे से लौट गयी |
हाँ सायद सोच होगा विमार को क्या उठाना ||
अच्छा , और तुमको दाँत दिखाना जरुरी समझा
सुनो हम ठीक है
शाम से कोइ आना ना चाहिए घर में ||
तभी फिर घंटी बजी इस बार वर्मा जी थे
कहिये भाभी जी कैसे है
ठीक ही है ,
अब ठीक हो जाएँगी
आप तक्लुफ्फ ना करे
वर्मा जी ,
अरे हम तो हाल पूछने आये थे आप तो बेवजह ही गरम हो रहे है शर्मा जी ||
हां टेम्प्रेचर आया है हमको
का बात कर रहे है
कोरोना हो गया क्या आपको
ध्यान रखिये अपना |
अब जाओगे की बैक्ट्रिया की कहानी पढ़ाये तुमको ||
काहें अब काहें तुम नाराज हो रहे थे
तब तो बड़ा मिश्राइन संग बतिया रहे थे |
अरे उ तो ऐसे ही
वरना आपकी जगह कोइ ले सकता है क्या ||
आबो दर्द है तो बता दो अभी चौबे जी की वाइफ दाल मखनी बना रही हैं बोली है | आके दे जाएँगी ||
अरे ओ , कल्याणी
जी दीदी
आज दाल मखनी बना रही क्या
हां दीदी भाई साहब को बोले है
रात का खाना हम ले आएंगे
आप ठीक हैं ना
हां हां हम ठीक है
सुनो कुछ मत लाना सब ठीक है
शर्मा जी का पेट कुछ गड़बड़ हो गया है
बाकि आप सभी लोगो को
शुक्रिया आप सभी को ||
कम्बखत सर दर्द का नाटक का किये बवाल हो गया ||
कुछ बोली का श्रीमती जी ||
ना अपना काम करो ||
जी, जैसे आपकी आज्ञा ||
मैंने कहा वही तो कर रहे थे | मायके की गोली का असर बढ़ा रहे थे बढ़ गया | अब आ गया सुकुन ||
"समाप्त"
प्रिया मिश्रा :)
मैं आज जरा परेशान सा अपने लौन में घूम रहा था | तभी श्रीमती जी की चीखने की आवाज आई | मैं दौड़ा - दौड़ा गया | देखा श्रीमती जी अपने छोटे से दिमाग वाले सर को मोटे से कपड़े से बांध के बैठी है ||
मैंने कहाँ क्या हुआ ऐसे क्यों चिल्ला रही हैं आप | अभी सिर्फ मैं उठा हूँ सबको उठा के क्यों बताना चाहती है की सुबह का बर्तन मैं धोता हूँ ||
अरे वो बात नहीं है गट्टू के पापा वो हमारे सर में बहुत जोर का मरोड़ उठ रहा |
मैंने कहा सर में मरोड़ ये तुमने आधुनिक बात न कर दी कुछ |
हां हां सच में | लेकिन तुम रहने दो | वो मैं मायके से जो नीली , पिली , लाल गोलिया लेके आई हूँ वो ला दो जरा पानी के साथ |
मैंने कहाँ एक बात बताओ भाग्यवान ये जब भी तुम्हारे सर में दर्द होता है तुम मायके की गोलियां ही क्यों खाती हो | और भी तो दवाईया है ||
अरे नहीं - नहीं , ये मेरी माँ ने गावँ के बैध से बनवाई है ||
कौन वो हरी राम हलवाई का बेटा |
हां हां वही ||
वो तो कई वर्षो तक अपने पिता के साथ जलेबियाँ बनाता था | उसने कब बैध की पढ़ाई पढ़ ली ||
अरे वो पढता भी था और अपने पिता की मदद भी करता था |
मैं समझ गया था ये श्रीमती जी की चाल है मेरी संडे खराब करने की ||
मैंने जान बूझकर ,
जोर - जोर से बोलना सुरु कर दिया
अरे भाग्यवान कोइ बात नहीं ,अगर तुम्हारी तबियत खराब है तो मैं खाना बना लूंगा | तुम आराम कर लो |
तभी हमारी पड़ोसन ने सुन लिए बोली अरे शर्मा जी क्या आप भी , बहन जी की तबियत खराब है| तो हम कब काम आएंगे | अब एक ने सुन ली मेरा काम हो गया | मैंने दो कप चाय बनाई और आराम से सोफे पे बैठ के
अखबार के मजे लेने लगा | डोर - बेल बजी | मैं गया, तिवारी जी से अपनी धर्म पत्नी के साथ | दोनों आये अंदर और हाथ में कचौरियाँ हाय , "सुबह की चाय"" सुन्दर पड़ोसन" और 'कचौड़ी"और भी कुछ चाहिए क्या जीने को ||
तिवारी जी पत्नी जितनी सुन्दर है आये - हाय क्या बताये उस से भी अच्छा खाना बनाती है ||
तिवारी जी अपनी पत्नी से बोले तुम कहाँ बना दो शर्मा जी का तब तक मैंने और शर्मा जी बात कर लेते है |
और भाबी जी से भी हाल पूछ लो |
मैंने तो यु ही कह दिया | अरे नहीं - नहीं भाभी जी रहने दे मैं बना लूंगा | अंदर तो छोले - कुलचे चल रहे दे |
सुबह तो आहा क्या बताएं कचौड़ियो की खुसबू दिल में बैठ गयी है ||
अभी दोपहर के बारे में सोच ही रहा था की मिश्रा जी वाइफ आई दाल , चावल पापड़ चटनी |
वैसे ये दाल तो सादी थी ,लेकिन जाने क्यों मेरी श्रीमती जी को अब छौका लग चूका था ||
भन्नाते हुए बोली एजी , ये सब क्या है ??
और इ मिश्राइन इतना तुमको देख के दाँत कहे दिखा रही थी ?
हम का जाने भाग्यवान उनको सायद लगा होगा बीमार है हम "औसधी" दे रही थी शायद |
क्या कहाँ ?
अरे मैं कहाँ कुछ कह रहा हूँ | तुम बीमार थी इसलिए आई थी | तुम्हारा हाल पूछने |
अच्छा और दरवाजे से लौट गयी |
हाँ सायद सोच होगा विमार को क्या उठाना ||
अच्छा , और तुमको दाँत दिखाना जरुरी समझा
सुनो हम ठीक है
शाम से कोइ आना ना चाहिए घर में ||
तभी फिर घंटी बजी इस बार वर्मा जी थे
कहिये भाभी जी कैसे है
ठीक ही है ,
अब ठीक हो जाएँगी
आप तक्लुफ्फ ना करे
वर्मा जी ,
अरे हम तो हाल पूछने आये थे आप तो बेवजह ही गरम हो रहे है शर्मा जी ||
हां टेम्प्रेचर आया है हमको
का बात कर रहे है
कोरोना हो गया क्या आपको
ध्यान रखिये अपना |
अब जाओगे की बैक्ट्रिया की कहानी पढ़ाये तुमको ||
काहें अब काहें तुम नाराज हो रहे थे
तब तो बड़ा मिश्राइन संग बतिया रहे थे |
अरे उ तो ऐसे ही
वरना आपकी जगह कोइ ले सकता है क्या ||
आबो दर्द है तो बता दो अभी चौबे जी की वाइफ दाल मखनी बना रही हैं बोली है | आके दे जाएँगी ||
अरे ओ , कल्याणी
जी दीदी
आज दाल मखनी बना रही क्या
हां दीदी भाई साहब को बोले है
रात का खाना हम ले आएंगे
आप ठीक हैं ना
हां हां हम ठीक है
सुनो कुछ मत लाना सब ठीक है
शर्मा जी का पेट कुछ गड़बड़ हो गया है
बाकि आप सभी लोगो को
शुक्रिया आप सभी को ||
कम्बखत सर दर्द का नाटक का किये बवाल हो गया ||
कुछ बोली का श्रीमती जी ||
ना अपना काम करो ||
जी, जैसे आपकी आज्ञा ||
मैंने कहा वही तो कर रहे थे | मायके की गोली का असर बढ़ा रहे थे बढ़ गया | अब आ गया सुकुन ||
"समाप्त"
प्रिया मिश्रा :)
Too good story
ReplyDeletethank you :)
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