रिमझिम :- मैम , आप इतनी सफल लेखिका है आपके लिए कितना अच्छा होता होगा ना , अपनी बात आसानी से रख पाना |
रिया :- इतना आसान भी नहीं था ये सब , कई ठोकरे खाई है , तब जाके कलम सही पकड़ना आया है |
रिमझिम :- मैम मैं आपके बारे में जानना चाहती हूँ , आज आप दोस्त समझ के अपने पुराने जीवन के पन्ने पलट दीजिये मेरे लिए ||
रिया :- पुराना जीवन गुजर चूका है , रिमझिम | गुजरे हुए कल में जाया जा सकता है | लेकिन वहाँ जाके लौटा नहीं जा सकता | ये सब आसान ना होगा | आज जो मैं हूँ वो बिता हुआ इतिहास है उसे पलटना अब मुझसे ना हो पायेगा ||
रिमझिम :- मैम ट्राय तो करिये सायद आपकी कहानी किसी की प्रेरणा बन जाये |
रिया :- रिमझिम हर गुजरा हुआ कल किसी न किसी के लिए एक सन्देश ही होता है ||
रिमझिम : - लेकिन मैम मैं आपके जीवन की उस किरण को प्रकाश बनान चाहती हूँ जो , अँधेरे में ग़ुम हैं , जिसे बस एक झरोखा चाहिए खिलने के लिए ||
रिया :- अच्छा तो बताओ क्या जानना चाहती हो ?
रिमझिम :- मैम आपको लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली ?
रिया :- लिखने की प्रेरणा किसी और ने मुझे नहीं दी | नाही कभी मेरे घर वालो ने या मेरे सगे सम्बन्धियों ने ऐसे कभी प्रोत्साहित किया | ये बस मेरी आत्मा की आवाज थी | वास्तव में जब मैंने पहली बार कुछ लिखा था तो सब मुझपे हस्ते थे | बेवकूफ लड़की , आजकल लेखकों की रोटी के मांदे है | बात उनकी सच थी | लेकिन मेरी आत्मा में शब्द बस्ते थे | मुझे कविताओ और कहानियों के सपने आते थे | मैं क्या करती ,इतने विचार कहाँ रखती तो मैंने इन्हे कागज पे उतारना सुरु किया और ये कविता - कहानी बनाने लगे |
रिमझिम :- आपकी आत्मा ने आपको सही राह दिखाया | वरना आजकल भटकने वाले और भटकाने वाले दोनों ही बहोत है |
मैम जब आपने लिखना सुरु किया था , तब क्या आपको किसी प्रकाशन द्वारा सराहा गया था जैसा की अभी है |
रिया :- नहीं ऐसा कुछ नहीं था | लेकिन मुझे लिखने की भूख थी | मैं जितना लिखती उतनी बढ़ती जाती |
मैंने कई सम्पादको को सन्देश भेजे , कई से संपर्क साधना चाहा लेकिन कुछ ना हुआ | अब पत्थर को हिरा बनाना कोइ नहीं चाहता | फिर मैंने खुद ही अपनी लेखनी को प्रकाश में लाने के लिए छोटे - छोटे प्रयाश किये |
धीरे - धीरे वो लगे | उन दिनों मेरे पास पैसो की कमी भी रहती थी | इतना खर्चा करना | कुछ भी खरीदना मुश्किल था | फिर कैसे किसी अपनी लेखनी को पैसो से तोलती किसे कहती मेरे कहानियाँ प्रकाशित करो मैं उसका मूल्य दूंगी || जिंदगी का ही मूल्य उस समय चुकाना मुश्किल था |
लोगो के ताने , भविष्य का डर , रोटी की चिंता , और नारी होने का एहसास | उसपे ये लिखने की जिद्द |
सब तभी मेरे जान के दुश्मन हुआ करते थे | लेकिन वो कहते है ना , दुश्मन से बड़ा कोइ मित्र नहीं होता | बस उसके कहे को स्वीकार कर लो और खुद में सुधार करना सुरु कर दो |
फिर दुनिया ढूंढेगी आपको और आप सितारे बन जाओगे | ये कलम की ताकत बहोत है | इस स्याही में बहोत दम है | इसमें जीवन बस्ता है | अपने सपनो को रात में ग़ुम मत करो इन्हे उड़ान दो | लोग तो ताने देंगे ही | उस तानो को आगा बना लो | और चल पड़ो उस आग की मशाल लेके | रौशनी खुद ही तुम्हारा कदम चूमेगी ||
रिया :- इतना आसान भी नहीं था ये सब , कई ठोकरे खाई है , तब जाके कलम सही पकड़ना आया है |
रिमझिम :- मैम मैं आपके बारे में जानना चाहती हूँ , आज आप दोस्त समझ के अपने पुराने जीवन के पन्ने पलट दीजिये मेरे लिए ||
रिया :- पुराना जीवन गुजर चूका है , रिमझिम | गुजरे हुए कल में जाया जा सकता है | लेकिन वहाँ जाके लौटा नहीं जा सकता | ये सब आसान ना होगा | आज जो मैं हूँ वो बिता हुआ इतिहास है उसे पलटना अब मुझसे ना हो पायेगा ||
रिमझिम :- मैम ट्राय तो करिये सायद आपकी कहानी किसी की प्रेरणा बन जाये |
रिया :- रिमझिम हर गुजरा हुआ कल किसी न किसी के लिए एक सन्देश ही होता है ||
रिमझिम : - लेकिन मैम मैं आपके जीवन की उस किरण को प्रकाश बनान चाहती हूँ जो , अँधेरे में ग़ुम हैं , जिसे बस एक झरोखा चाहिए खिलने के लिए ||
रिया :- अच्छा तो बताओ क्या जानना चाहती हो ?
रिमझिम :- मैम आपको लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली ?
रिया :- लिखने की प्रेरणा किसी और ने मुझे नहीं दी | नाही कभी मेरे घर वालो ने या मेरे सगे सम्बन्धियों ने ऐसे कभी प्रोत्साहित किया | ये बस मेरी आत्मा की आवाज थी | वास्तव में जब मैंने पहली बार कुछ लिखा था तो सब मुझपे हस्ते थे | बेवकूफ लड़की , आजकल लेखकों की रोटी के मांदे है | बात उनकी सच थी | लेकिन मेरी आत्मा में शब्द बस्ते थे | मुझे कविताओ और कहानियों के सपने आते थे | मैं क्या करती ,इतने विचार कहाँ रखती तो मैंने इन्हे कागज पे उतारना सुरु किया और ये कविता - कहानी बनाने लगे |
रिमझिम :- आपकी आत्मा ने आपको सही राह दिखाया | वरना आजकल भटकने वाले और भटकाने वाले दोनों ही बहोत है |
मैम जब आपने लिखना सुरु किया था , तब क्या आपको किसी प्रकाशन द्वारा सराहा गया था जैसा की अभी है |
रिया :- नहीं ऐसा कुछ नहीं था | लेकिन मुझे लिखने की भूख थी | मैं जितना लिखती उतनी बढ़ती जाती |
मैंने कई सम्पादको को सन्देश भेजे , कई से संपर्क साधना चाहा लेकिन कुछ ना हुआ | अब पत्थर को हिरा बनाना कोइ नहीं चाहता | फिर मैंने खुद ही अपनी लेखनी को प्रकाश में लाने के लिए छोटे - छोटे प्रयाश किये |
धीरे - धीरे वो लगे | उन दिनों मेरे पास पैसो की कमी भी रहती थी | इतना खर्चा करना | कुछ भी खरीदना मुश्किल था | फिर कैसे किसी अपनी लेखनी को पैसो से तोलती किसे कहती मेरे कहानियाँ प्रकाशित करो मैं उसका मूल्य दूंगी || जिंदगी का ही मूल्य उस समय चुकाना मुश्किल था |
लोगो के ताने , भविष्य का डर , रोटी की चिंता , और नारी होने का एहसास | उसपे ये लिखने की जिद्द |
सब तभी मेरे जान के दुश्मन हुआ करते थे | लेकिन वो कहते है ना , दुश्मन से बड़ा कोइ मित्र नहीं होता | बस उसके कहे को स्वीकार कर लो और खुद में सुधार करना सुरु कर दो |
फिर दुनिया ढूंढेगी आपको और आप सितारे बन जाओगे | ये कलम की ताकत बहोत है | इस स्याही में बहोत दम है | इसमें जीवन बस्ता है | अपने सपनो को रात में ग़ुम मत करो इन्हे उड़ान दो | लोग तो ताने देंगे ही | उस तानो को आगा बना लो | और चल पड़ो उस आग की मशाल लेके | रौशनी खुद ही तुम्हारा कदम चूमेगी ||
Comments
Post a Comment