तेरी आँखों में एक खाली सा आसमान है
जिसमे , मेरे सपनो का सूरज निकलता भी है
डूबता भी है
प्रिया मिश्रा :)
सम्बन्धो के किले में अब
खुले बागानों वाली रौशनी नहीं आती
प्रिया मिश्रा
जिन दुकानों की पूंजी लूट जाती है
वहाँ अक्सर मेला लगता है
प्रिया मिश्रा
****************************************************************************
मैं तो बस इतना चाहती हूँ
कुछ गुलाब खीलें बागों में
ये हर वक़्त सफ़ेद रंग नहीं भाता ||
प्रिया मिश्रा :)
********************************************************************************
तेरे घर का रास्ता कितने पथरीले रास्तो से होकर जाता है
लहूलुहान पैर के निशान दिखें तो समझ लेना
कोइ सरफिरा आशिक़ है तुम्हारा भी
जिसे नंगे पाँव चलने की आदत है
अब भी
इंकार से उसका दिल नहीं भरा
एक दीदार की चाहत है उसे अब भी
प्रिया मिश्रा :)
*****************************************************************************
मैं कैसे मान लूँ सब कुछ बदल गया है
आज भी वो हरे - भरे रास्तो की बिच
पगडंडियों से गुजरता तेरे घर का रास्ता
वही है ,
और तेरा घर भी वही है
वही सच की नीव पे टिका
घर , जिसमे बस्ती है
अंदर
तेरी यादें
बाहर प्रकृति की मुस्कान
प्रिया मिश्रा :)
********************************************************************************
मैं पहाड़ो में रह के भी पत्थर नहीं हुई
कितने जिंदादिल है ये
पत्थर से दिखने वाले
प्रकृति के आँचल में टाके ये आफताब ||
प्रिया मिश्रा
*********************************************************************************
मैं बेवक़्त में आए हूँ लहर थी
वो किनारा - किनारा कटता गया ||
घंटे गुजरे इन्तजार में
और वक़्त वर्षो में बदलता रहा ||
ये और बात थी
दरवाजे की दस्तक जगा देती थी हमें
मगर एक ख्वाब था जो उम्र भर सोता रहा ||
प्रिया मिश्रा :)
***************************************************************************
बार - बार पुकारा था मैंने
और वो हाथ छुड़ा के
ऐसे मुड़ गया जैसे
हाथ से रेत फिसल जाया करते है
आहिस्ता - आहिस्ता
बिना शोर के
और कहता गया खुस रहना
कोइ बताये उसे
सफ़ेद लिबाश में
कोइ सुहागन कैसे रह सकता है
प्रिया मिश्रा :)
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जिसमे , मेरे सपनो का सूरज निकलता भी है
डूबता भी है
प्रिया मिश्रा :)
सम्बन्धो के किले में अब
खुले बागानों वाली रौशनी नहीं आती
प्रिया मिश्रा
जिन दुकानों की पूंजी लूट जाती है
वहाँ अक्सर मेला लगता है
प्रिया मिश्रा
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मैं तो बस इतना चाहती हूँ
कुछ गुलाब खीलें बागों में
ये हर वक़्त सफ़ेद रंग नहीं भाता ||
प्रिया मिश्रा :)
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तेरे घर का रास्ता कितने पथरीले रास्तो से होकर जाता है
लहूलुहान पैर के निशान दिखें तो समझ लेना
कोइ सरफिरा आशिक़ है तुम्हारा भी
जिसे नंगे पाँव चलने की आदत है
अब भी
इंकार से उसका दिल नहीं भरा
एक दीदार की चाहत है उसे अब भी
प्रिया मिश्रा :)
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मैं कैसे मान लूँ सब कुछ बदल गया है
आज भी वो हरे - भरे रास्तो की बिच
पगडंडियों से गुजरता तेरे घर का रास्ता
वही है ,
और तेरा घर भी वही है
वही सच की नीव पे टिका
घर , जिसमे बस्ती है
अंदर
तेरी यादें
बाहर प्रकृति की मुस्कान
प्रिया मिश्रा :)
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मैं पहाड़ो में रह के भी पत्थर नहीं हुई
कितने जिंदादिल है ये
पत्थर से दिखने वाले
प्रकृति के आँचल में टाके ये आफताब ||
प्रिया मिश्रा
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मैं बेवक़्त में आए हूँ लहर थी
वो किनारा - किनारा कटता गया ||
घंटे गुजरे इन्तजार में
और वक़्त वर्षो में बदलता रहा ||
ये और बात थी
दरवाजे की दस्तक जगा देती थी हमें
मगर एक ख्वाब था जो उम्र भर सोता रहा ||
प्रिया मिश्रा :)
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बार - बार पुकारा था मैंने
और वो हाथ छुड़ा के
ऐसे मुड़ गया जैसे
हाथ से रेत फिसल जाया करते है
आहिस्ता - आहिस्ता
बिना शोर के
और कहता गया खुस रहना
कोइ बताये उसे
सफ़ेद लिबाश में
कोइ सुहागन कैसे रह सकता है
प्रिया मिश्रा :)
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