जब मैं आखरी साँस ले रही होंगी
तब भी हाथ में कलम होगा
और कागज में , मैं जीवन लिख जाउंगी ||
प्रिया मिश्रा :)
******************************
मैं बच्चे जैसा दीखता हूँ
मैं बच्चा नहीं हूँ
भूख ने मुझे मुझे बड़ा बना दिया
गली - गली घूम के कमाना सीखा दिया
मैं फूल हाथ में लिए खड़ा हूँ
मैं फूल था
लेकिन अब बिक रहा हूँ
मैं धुप में सीक रहा हूँ
मैं बच्चे जैसा दीखता हूँ
मैं बच्चा नहीं हूँ
प्रिया मिश्रा :)
*********************************
क्यों ना ब्रह्मांड में स्थिरता लाया जाय
स्त्री - पुरुष को रहने दे
क्यों ना मानवता को उभारा जाये
स्त्री - पुरुष
सब साथ आ जायेंगे
जब मानवता ख़िल के आएगी
ना स्त्री बड़ी है
न स्त्री त्यागी है
न पुरुष बड़ा है
ना पुरुष त्यागी है
याद कर लो मानवता को
मानवता सबपे भारी है ||
प्रिया मिश्रा :)
***************************************************************
हर किसी के बात पे दिल नहीं आ जाता
वो कभी - कभी फिसलता है
दिल के फिसलने के लिए दिल का चलना जरुरी है
और दिल के चलने के लिए ,
दिल का ज़िंदा होना जरुरी है
और दिल के ज़िंदा होने के लिए
दिल का धड़कना जरुरी है ||
प्रिया मिश्रा :)
*******************************************************************
मैंने सुबह - सुबह सूरज को देखा है
उसके प्रकाश को महसूस किया है
उसकी किरणों से मेरी आँखे चमक आई है
मैंने एक नया जीवन फिर से देखा है
नवजीवन फूटा है मुझमे
मैं धन्यवाद करती हूँ
प्रकृति को
मैंने फिर से खुद को देखा है
प्रिया मिश्रा :)
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जब मैं थकी हुई थी
मुझे पता ना था
मैं आराम से सो जाउंगी
मुझे झपकी नहीं आती थी
मैं कैसे सपनो में खो जाउंगी
फिर आया एक इंद्रधनुष
मुझे रंगो में बहा ले गया
मैं बैठी आँगन में
मुझे अपने बाँहों में उठा ले गया
अब सबेरा हो ना हो
मेरी आँखों में चमकता रहेगा
एक सूर्य सुनहरा सा ||
प्रिया मिश्रा :)
***********************************************************************************
मैं तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं मानती
बस इसी बात का तुम बुरा मान जाते हो ||
प्रिया मिश्रा :)
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हमारे यहाँ लोग कहते है कि वो एक हैं
लेकिन उन पागलो को पता ही नहीं की वो
जाट - पात
धर्म - अधर्म
भेद - भाव
स्त्री -पुरुष
न्याय - अन्याय में
बिभक्त है
ये दुखदाई है
लेकिन सत्य है ||
प्रिया मिश्रा :)
*****************************************************************************
फिर दिन सुरु हो गया
कटाक्ष भरे भेदभाव के साथ
चाहेँ घर हो
चाहें बाहर
या दफ्तर
या राजनीती
कटाक्ष
सर्वोपरि है ||
प्रिया मिश्रा :)
*************************************************************************************
आँखों में रहने दो आँखों की बातें
की आँखों की बातो से दिल डरता है
ये आँखों का मशला आँखे ना सुलझा पाएंगी
इनमे समुन्द्र बस्ता है
ये उफान पे आ जाएँगी
तब कहाँ कोइ शब्द ख़िल के आएगा
सबकुछ पानी सा बह जायेगा
जज़्बात तुम्हारे
जज्बात हमारे
अब केवल शब्द नहीं
एक आत्मा और दो शरीर है
लेकिन फिर भी रहने दो
आंखों की बातें ||
प्रिया मिश्रा :)
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पुनर्जन्म लेना आसान नहीं होता है
पहले टूटना पड़ता है अपने ही पेड़ से
सड़ना पड़ता है
गलना पड़ता है
दबी हुई जमीं में सिसकना होता है
तब फूटता है
अंकुर पुनर्जन्म का ||
प्रिया मिश्रा :)
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घर में काम - काज तो बहोत किये मैंने
सारी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभाई
लेकिन अब भी वो एक काम बाकि है
जिसके लिए मेरे जन्म हुआ है
और वो कर्म है
खुद को खुद से मिलाना
एक ऐसा संगम जो त्रिवेणी कहलाये
जहाँ मैं
मेरी आत्मा
और परमात्मा एक हो जाये
प्रिया मिश्रा :)
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तब भी हाथ में कलम होगा
और कागज में , मैं जीवन लिख जाउंगी ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैं बच्चे जैसा दीखता हूँ
मैं बच्चा नहीं हूँ
भूख ने मुझे मुझे बड़ा बना दिया
गली - गली घूम के कमाना सीखा दिया
मैं फूल हाथ में लिए खड़ा हूँ
मैं फूल था
लेकिन अब बिक रहा हूँ
मैं धुप में सीक रहा हूँ
मैं बच्चे जैसा दीखता हूँ
मैं बच्चा नहीं हूँ
प्रिया मिश्रा :)
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क्यों ना ब्रह्मांड में स्थिरता लाया जाय
स्त्री - पुरुष को रहने दे
क्यों ना मानवता को उभारा जाये
स्त्री - पुरुष
सब साथ आ जायेंगे
जब मानवता ख़िल के आएगी
ना स्त्री बड़ी है
न स्त्री त्यागी है
न पुरुष बड़ा है
ना पुरुष त्यागी है
याद कर लो मानवता को
मानवता सबपे भारी है ||
प्रिया मिश्रा :)
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हर किसी के बात पे दिल नहीं आ जाता
वो कभी - कभी फिसलता है
दिल के फिसलने के लिए दिल का चलना जरुरी है
और दिल के चलने के लिए ,
दिल का ज़िंदा होना जरुरी है
और दिल के ज़िंदा होने के लिए
दिल का धड़कना जरुरी है ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैंने सुबह - सुबह सूरज को देखा है
उसके प्रकाश को महसूस किया है
उसकी किरणों से मेरी आँखे चमक आई है
मैंने एक नया जीवन फिर से देखा है
नवजीवन फूटा है मुझमे
मैं धन्यवाद करती हूँ
प्रकृति को
मैंने फिर से खुद को देखा है
प्रिया मिश्रा :)
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जब मैं थकी हुई थी
मुझे पता ना था
मैं आराम से सो जाउंगी
मुझे झपकी नहीं आती थी
मैं कैसे सपनो में खो जाउंगी
फिर आया एक इंद्रधनुष
मुझे रंगो में बहा ले गया
मैं बैठी आँगन में
मुझे अपने बाँहों में उठा ले गया
अब सबेरा हो ना हो
मेरी आँखों में चमकता रहेगा
एक सूर्य सुनहरा सा ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैं तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं मानती
बस इसी बात का तुम बुरा मान जाते हो ||
प्रिया मिश्रा :)
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हमारे यहाँ लोग कहते है कि वो एक हैं
लेकिन उन पागलो को पता ही नहीं की वो
जाट - पात
धर्म - अधर्म
भेद - भाव
स्त्री -पुरुष
न्याय - अन्याय में
बिभक्त है
ये दुखदाई है
लेकिन सत्य है ||
प्रिया मिश्रा :)
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फिर दिन सुरु हो गया
कटाक्ष भरे भेदभाव के साथ
चाहेँ घर हो
चाहें बाहर
या दफ्तर
या राजनीती
कटाक्ष
सर्वोपरि है ||
प्रिया मिश्रा :)
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आँखों में रहने दो आँखों की बातें
की आँखों की बातो से दिल डरता है
ये आँखों का मशला आँखे ना सुलझा पाएंगी
इनमे समुन्द्र बस्ता है
ये उफान पे आ जाएँगी
तब कहाँ कोइ शब्द ख़िल के आएगा
सबकुछ पानी सा बह जायेगा
जज़्बात तुम्हारे
जज्बात हमारे
अब केवल शब्द नहीं
एक आत्मा और दो शरीर है
लेकिन फिर भी रहने दो
आंखों की बातें ||
प्रिया मिश्रा :)
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पुनर्जन्म लेना आसान नहीं होता है
पहले टूटना पड़ता है अपने ही पेड़ से
सड़ना पड़ता है
गलना पड़ता है
दबी हुई जमीं में सिसकना होता है
तब फूटता है
अंकुर पुनर्जन्म का ||
प्रिया मिश्रा :)
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घर में काम - काज तो बहोत किये मैंने
सारी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभाई
लेकिन अब भी वो एक काम बाकि है
जिसके लिए मेरे जन्म हुआ है
और वो कर्म है
खुद को खुद से मिलाना
एक ऐसा संगम जो त्रिवेणी कहलाये
जहाँ मैं
मेरी आत्मा
और परमात्मा एक हो जाये
प्रिया मिश्रा :)
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