"आये मेरे फूफा जी "
गर्मियों की छुटियाँ बिताने आये मेरे फूफा जी
बड़े - बड़े नखरे इनके
तनिक भी ना भाये किसी को मेरे फूफा जी ||

कभी कहते पानी लावो
कभी कहते पंखा झलो
कभी लगाते हमारी चुगली
कभी कहते किसी को कुछ
कभी कहते किसी को कुछ ||

सुबह - सुबह के गलाले इनके
 गलगलगालगलगल
नींद की उड़ गयी धजिया
मां दिन भर तले उनके लिए भजिया
हम हुए परेशान
उनके खर्राटे हुए
महान
आह हुफ्फ आह हुफ्फ
आह हफ्फ्फ्फ्फ्फ़
हुर्रर्रर्रर्र
फुर्रररररर
ऐसे गुजारी राते हमने जैसे कोइ अजगर सोया हो पास में
अब ना झेले जाये फूफा जी

लगाई हमने तरकीब
लाया एक कमाल का आईडिया
घूमने का कह के हम
ले गए फूफा जी को
कराई उनकी जेब धुलाई
किया पैसो का
तड़ातड़ धधड़ाधड़
खर्चे का वार
दूसरे दिन आया सोमवार
फूफा जी ने टिकिट कराई
भागे वो सरपट
झटपट
हमने कहा फूफा जी
ऐसे हमें छोड़ के ना जाओ
एक बार के लिए ही सही
एक मेला अभी बाकि है
फूफा जी
अब तो लौट आओ

प्रिया मिश्रा

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog